शनिवार, 16 अप्रैल 2022

Introduction of the Kaushik Gotra's Kumbhi community of Bargayan people

कौशिक गोत्र का परिचय

लेखक, स्वामी सत्यानन्द उर्फ़ प्रसेनजित सिंह कौशिक

ब्रह्मर्षि कौशिक विश्वामित्र भगवान के बारे में एक तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, दूसरा इनके बारे में कुछ जानकारी उपलब्ध है भी तो झूठी और गलत जानकारी ही ज्यादा है। इसका मूल कारण है इनसे सम्बन्धित आलेख लिखने वाले लोगों का हमारे कौशिक गोत्रीय समाज से सम्बन्धित नहीं होना। मैंने गूगल सर्च के दौरान ऐसे कई आलेख देखें हैं जिसमें से कुछ आलेखों में कौशिक विश्वामित्र भगवान को कुशनाभ का पौत्र बताया गया है, तो कई आलेखों में कुशाम्ब का पौत्र बताया गया है। जबकि सच्चाई यह है कि कौशिक विश्वामित्र भगवान! कुशिक के पौत्र थे। कुशिक के पुत्र होने के कारण ही कौशिक विश्वामित्र भगवान के पिता महेन्द्र गाधी! कौशिक के नाम से विख्यात हुए। कौशिक गाधी की ज्येष्ठ पुत्री सत्यवती काली जो भृगुवंशी ब्राह्मण ऋचिक ऋषि की पत्नी और जमदग्नि ऋषि की माता थी, वे भी कुशिक वंशी होने के कारण कौशिकी कहलायी।


कौशिकी काली! कौशिक विश्वामित्र जी की ज्येष्ठ बहन और कौशिक गाधी की ज्येष्ठ पुत्री थी। जिस स्थान पर इनका निवास स्थल था वहाँ पर प्रवाहित होने वाली नदी इसी देवी के नाम पर आज भी काली नदी के नाम पर विख्यात है जबकि यही नदी आगे बढ़ने पर कोसी नदी (कौशिकी नदी का अपभ्रंश) के नाम से पहचाना जाता है।

बलकाश्व नन्दन कुश के चार पुत्रों कुशिक, कुशनाभ, कुशाम्ब और मूर्तिमान में से कुशिक ज्येष्ठ थे तथा वनवासी पह्लवों के साथ पल कर बड़े हुए थे। राजा कुशिक की पत्नी पुरुकुत्सकी सूर्यवंशी राजा पुरुकुत्स की पुत्री थी।

कौशिक विश्वामित्र भगवान की पत्नी शालावती के गर्भ से उत्पन्न तीन पुत्रों देवश्रवा, कात्यायन गोत्र के प्रवर्तक कति और एक अन्य पुत्र हिरण्याक्ष का जन्म हुआ था। विदित हो की हिरण्याक्ष नामक एक राजा हिरण्यकशिपु के भी छोटे भाई हुए थे, लेकिन ये हिरण्याक्ष कौशिक विश्वामित्र भगवान के पुत्र थे। कौशिक विश्वामित्र भगवान की दूसरी पत्नी रेणु से उत्पन्न पुत्रों के नाम रेणुमान, सांकृति, गालव, मुद्गल, मधुछन्द, जय और देवल था। दृषद्वती के गर्भ से अष्टक का जन्म हुआ जबकि ययाति नन्दन यदु की बहन माधवी के गर्भ से कच्छप और हारित का जन्म हुआ था। नर्मदा नदी के तट पर स्थित नर्मपुर वासीनी देवी चक्षुष्मति के गर्भ से भगवान अग्निदेव को भी कौशिक विश्वामित्र भगवान ने जन्म दिया था। इनके अलावा पाणिन, बभ्रु, ध्यानजप्य, पार्थिव, शुनःशेप देवरात, शालङ्कायन, बाष्कल, लोहित, यामदूत, कारीषु, सौश्रुत, कौशिक, सैन्धवायन, देवल, रेणु, याज्ञवल्क्य, अघमर्षण, औदुम्बर, अभिष्णात, तारकायन, चुञ्चुल, शालावत्य और सांकृत सहित कौशिक विश्वामित्र भगवान को १०८ विद्वान पुत्र हुए थे। यह बात और है कि कौशिक विश्वामित्र भगवान के आठ पुत्रों के जन्म लेने से पहले हुए एक विवाद के दौरान महर्षि वशिष्ठ ने कौशिक विश्वामित्र भगवान के एक पुत्र को जीवित छोड़ कर सभी ९९ पुत्रों का अपने आश्रम में ही छल पूर्वक हत्या कर दिया था। एक ब्राह्मण के द्वारा हुए शर्मनाक हार और पुत्रशोक के कारण राजपाट त्याग कर तपोभूमि में जाने के बाद कौशिक विश्वामित्र भगवान ने कच्छप, हारित, शुनःशेफ, गालव और अग्नि आदि आठ पुत्रों को भी जन्म दिया था। 


इसके अलावा एक अप्सरा मेनका के गर्भ से भी कौशिक विश्वामित्र भगवान के अंश से देवी शकुन्तला ने जन्म लिया था, जो राजर्षि कण्व की दत्तक पुत्री बन कर पुरुवंशी राजा दुष्यंत कुमार की पत्नी और भरत की माता बनी थी। वन देवी शकुन्तला के अलावा कौशिक विश्वामित्र भगवान की एक और अति सुन्दरी कन्या थी। जो जन्म से ही कुब्जा होने के कारण कान्यकुब्ज के नाम से प्रसिद्ध थी। देवी कान्यकुब्ज के पुत्रों द्वारा शासित राज्य ही कन्नौज के के नाम से विख्यात हुआ था। वैदिक कथाओं में स्पष्ट उल्लेख है कि कौशिक विश्वामित्र भगवान के कुशिक नामक पूर्वज़ वनवासी पह्लवों के साथ बड़े हुए थे। मतलब यह कि पह्लव कहलाने वाले लोग राजा कुशिक के समय मौजूद थे। जबकि वशिष्ठ और विश्वामित्र भगवान के बीच वशिष्ठ आश्रम में ही होने वाले विवाद के दौरान कुछ पुस्तकों में ऐसा उल्लेख है कि वशिष्ठ ऋषि की प्रार्थना करने पर कामधेनु गाय ने अपने स्वांस से पह्लव नामक युद्धप्रिय सैनिकों को उत्पन्न किया था। पौराणिक कथाओं में इस तरह की अलंकारिक भाषा का उल्लेख ही इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इन कथाओं को लिखने वाले लोगों की मंशा कौशिक गोत्रीय लोगों को अपमानित करना है। यही कारण है कि आज भी वशिष्ठ समर्थक ब्राह्मणों के द्वारा कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों को यज्ञ अनुष्ठान करवाने और दान लेने के अधिकार का विरोध करते हैं। जबकि भगवान शिव ने कौशिक विश्वामित्र भगवान को ब्रह्मर्षि कहलाने का वरदान दिया था तब शिव पुत्र कार्तिकेय भगवान ने कौशिक विश्वामित्र भगवान से दीक्षा लेकर उन्हें ब्राह्मण के रूप में मान्यता दिये भी दिये थे। सिर्फ़ इतना ही नहीं बल्कि सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित करके सामुहिक रूप से यह निर्णय लिया गया था कि आज से जितने भी देवी-देवता हैं उन्हें मिलने वाले यज्ञ भाग विश्वामित्र नन्दन भगवान अग्निदेव के द्वारा ही प्राप्त करने होंगे। इसके लिए सबसे पहले अग्निदेव की स्वाहा नामक ज्येष्ठ पत्नी के द्वारा यज्ञ सामग्री भगवान अग्निदेव को समर्पित किया जाएगा तथा अग्निदेव के द्वारा ही अन्य देवी-देवताओं और पितरों को दिया जाएगा। इसके लिए विश्वामित्र भगवान के पुत्र ब्रह्मऋषि हारित ने यज्ञोपवित और यज्ञ अनुष्ठान के जो नियम बनाया, उसे ही तीनों लोकों में सर्वसम्मति से लागू किया गया था। आज भी उन्हीं रीति-रिवाजों से यज्ञ अनुष्ठान किये जाते हैं। लेकिन आज तक कौशिक विश्वामित्र भगवान के प्रति द्वेष भाव रखने वाले पाखण्डियों की जमात कौशिक गोत्रीय लोगों को ब्राह्मण मानने से इंकार करते हैं। लेकिन जो लोग कौशिक गोत्रीय हैं उन्हें अपने सोये हुए स्वाभिमान को जगाने की जरूरत है।

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