![]() |
| गोमन्त पर्वत की किनाबालु नामक पर्वत चोटी |
![]() |
| गोमन्त पर्वत की किनाबालु नामक पर्वत चोटी |
![]() |
| गोमन्त पर्वत की विभिन्न चोटियों तक जाने वाली गोमन्तक (गोमन्तोंग) गुफाएं |
प्रागैतिहासिक मलेशिया में महाभारत के साक्ष्य :
महाभारत युद्ध में वृहद पैमाने पर हुए परमाण्विक विस्फोटों के कारण ही हीमग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जल सतह इतना बढ़ गया था कि द्वारका रातों-रात डूब गया था। द्वारका की तरह ही विश्व के अन्य भागों में भी कम ऊंचाई वाले भूमि पर स्थित हजारों गाँव और नगर डूबे होंगे। यह बात अलग है कि इसके प्रमाण हमारे पास नहीं हैं। लेकिन विश्व की लगभग सभी सभ्यताओं के लोग जल प्रलय की घटना को अलग-अलग कहानियों के द्वारा स्वीकार करते हैं। इनमें क्रिश्चियन और इस्लाम धर्म के लोग भी हैं। लेकिन ये लोग वेदों और पुराणों की कथा को झूठा और काल्पनिक कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित देवी-देवताओं की कथा, सहस्र कोटी युग से ब्रम्हाण्ड का अस्तित्व, निश्चित काल की अवधि समाप्त होने के बाद होने वाले प्रलय और सृष्टि के चक्र की बातों सहित अयोध्या के राजा राम और उनके द्वारा बनवाये गये सेतु तथा द्वारकाधीश कृष्ण और उनके द्वारा बसाये गये द्वारका नामक नगर के समुद्र में डूबने की कथा को भी काल्पनिक कह कर हिन्दुओं का मजाक उड़ाते थे। लेकिन जब जल प्रदुषण के कारण होने वाले नुकसान का पता लगाने के लिए किये जाने वाले अनुसन्धान के क्रम में भारतीय वायु सेना के लोगों को पुराणों में वर्णित स्थान पर समुद्र में जल सतह के नीचे डूबे हुए एक भव्य नगर के अवशेषों का पता चला तब भारत सरकार ने उन पुरातत्विक साक्ष्यों के नमूनों का जाँच करने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और श्रीलंका की सरकारों को भी आमंत्रित किया था। ताकि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की प्राचीनता पर सन्देह करने वाले लोगों को पुराणों और वेदों में वर्णित कथाओं पर विश्वास हो सके। उस निमंत्रण के बाद विश्व के कई संस्थान भौगोलिक अन्वेषण के लिए भारत सरकार से द्वारका के भूमिगत अवशेषों के नमुने माँग कर ले गये। इस घटना के बाद वैदिक ग्रन्थों का मजाक उड़ाने वाले लोगों को द्वारका के अस्तित्व पर विश्वास हुआ। लेकिन द्वापर युग में हुए महाभारत युद्ध के बाद अप्रत्याशित रूप से बढ़े हुए जल सतह के कारण और कितनी सभ्यता लुप्त हुई इसका पता करने में किसी ने रुचि नहीं लिया। लेकिन महाभारत ग्रन्थ में वर्णित स्थानों के बारे में पता करने के दौरान काफ़ी खोजबीन करने पर भी जब मुझे कई स्थान अनुवादित पुस्तकों में बताये गये दिशा में नहीं मिले तो मुझे भी पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित कई घटनाएं और घटना स्थल मनगढ़ंत और काल्पनिक लगने लगे थे। लेकिन जब मुझे इस बात की जानकारी हुई कि लोगों की नजरों से ओझल द्वारका के अवशेष जल सतह के नीचे दिखाई देने के बाद वैदिक संस्कृति को मनगढ़ंत कहने वाले लोगों को भी उसके अस्तित्व पर विश्वास हो गया है, तब मेरे मन में यह ख्याल आया कि हो सकता है कि इन ग्रन्थों में वर्णित जो जगह आज नहीं दिख रहे हैं, वे भी द्वारका की तरह ही कहीं खो गया हो। मेरे जेहन में इस ख्याल के आते ही मैंने पौराणिक ग्रन्थों को दूबारा पढ़ना शुरू किया। द्विअर्थी और अस्पष्ट वाक्यांशों को गहराई से पढ़ने के दौरान मुझे जैसी अनुभूति हुई उसके अनुसार अपने अनुसन्धान के कार्य को बढ़ाता रहा। जिसका परिणाम यह हुआ कि वेदों में वर्णित ऐसे कई जगहों का पता लगा लिया, जो वर्तमान में अन्य नामों से पहचाने जाने के कारण हमारी पहुंच से दूर हो गया था। लेकिन उनकी पहचान वहाँ के लोगों की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को बचा कर रखने वाले कबीलों के रीति-रिवाजों की वैदिक काल के रीति-रिवाजों से समानता और भौगोलिक स्थानों यथा गाँव, नगर, नदी, पर्वत और सरोवरों के नामों का कारण पता करने के लिये योगनिद्रा के दौरान किये जाने वाले मन्थन से अतीत में छिपे हुए राज खुलने लगे। विलुप्त वैदिक नगरों, सरोवरों, पर्वतों और सभ्यताओं के बारे में आगे जो बताने जा रहा हूँ, उस पर हो सकता है कि आपको भी यकीन न हो। लेकिन संयम पूर्वक पूरे आलेख को पढ़ने और इसमें बताये गये जानकारियों के आधार पर ईमानदारी पूर्वक जाँच करने पर मेरी बातों पर जरूर यकीन हो जाएगा। ऐसा मेरा दावा है।
सबसे पहले आदि ग्रन्थ महाभारत में वर्णित गोमन्त पर्वत के बारे में जानते हैं। यह कहाँ है? इसे लेकर लोगों में काफी भ्रान्तियां हैं। आदि ग्रन्थ महाभारत के श्लोकों में निहित मूल भाव को समझे बगैर श्लोकों को सरसरी निगाह से पढ़ने वाले लोग यह दावा करते हैं कि वह गोमन्त पर्वत जहाँ मगध राज जरासंध और कृष्ण-बलराम की जोड़ी ने युद्ध किया था, वह सह्याद्रि की पर्वत श्रृङ्खलाओं में स्थित है। लेकिन इसकी तलाश करने पर गोमन्त पर्वत नामक एक भी पर्वत चोटी सह्याद्रि में नहीं दिखती है। कुछ लोग महाराष्ट्र के पश्चिमी तट पर स्थित गोआ नामक गाँव को गोमन्त कहते हैं। लेकिन हरिवंश पुराण व महाभारत नामक ग्रन्थ में गोमन्त की चोटी को बादलों से भी ऊपर बताया गया है। ऐसे में समुद्र की सतह से सामान्य ऊँचाई पर स्थित गोआ नामक प्रान्त गोमन्त पर्वत नहीं हो सकता है। सह्याद्रि के पहाड़ों में सबसे ऊँची चोटी वाला "कलशुबाई चोटी" जो महाराष्ट्र के इंदौर और ओखला के बीच बारी नामक गाँव के पास स्थित है उसकी ऊँचाई भी सरकारी आंकड़ों के अनुसार मात्र १६४६ मीटर है। जबकि गुगल के अनुसार मात्र १४६० मीटर है। ऐसे में इस पर्वत को भी मेरू पर्वत की तरह विशाल दिखने वाला गोमन्त पर्वत नहीं कहा जा सकता है। हाँ यह हो सकता है कि महाभारत ग्रन्थ में वर्णित वेणा नदी को पार कर के परशुराम जी के साथ श्रीकृष्ण और बलराम इसी पर्वत पर आये होंगे। लेकिन यहाँ पर आने के बाद आकाश मार्ग से गोमन्त नामक उस पर्वत पर गये होंगे जहाँ कई देवताओं को अप्सराओं के साथ दिव्य गति से विचरण करते हुए उन्होंने देखा था।
यह गोमन्त पर्वत या पुराणों में वर्णित इस पर्वत के लक्षणों से युक्त एक भी पर्वत सह्याद्रि की पर्वत चोटियों के दक्षिणी भाग में स्थित वनवासी जनपद के आस-पास भी नहीं दिखा। इसके बावजूद लोग जबरन दावा करते हैं कि गोमन्त पर्वत! सह्य पर्वत की चोटियों में से ही उस चोटी का नाम है जो अपने समय में मेरूगिरी की तरह ही ऊँचा था। हरिवंश पुराण के अध्याय ४० और ४१ में गोमन्त पर्वत के बारे में सिर्फ़ यही बताया गया है कि "भृगुवंशी परशुराम जी वसुदेव नन्दन श्रीकृष्ण और बलराम के साथ करवीरपुर में प्रवहित होने वाली वेणा नदी को अपनी भुजाओं से ही पार किये। तत्पश्चात दो पर्वतों के मध्य भाग से प्रवाहित होने वाली नदि के किनारे से चलते हुए विभिन्न पर्वतों की कन्दराओं में रहने वाले तपस्वीयों के दर्शन करते हुए सह्य पर्वत की सबसे ऊँची चोटी पर जा पहुंचे। वहाँ से नीचे उतर कर गुफा में प्रवेश कर के गोमन्त पर्वत पर जा पहुंचे। वह पर्वत आकाश से भी ऊपर तक उठी हुई थी और दूसरी मेरू जैसी जान पड़ती थी। उस पर्वत पर उन्होंने कई देवताओं और अप्सराओं को विचरण करते हुए देखा था।" लेकिन इस कथा में यह नहीं बताया गया है कि वे लोग सह्य पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पर से कहाँ पर और किस दिशा में उतरे। यह भी नहीं बताया गया है कि परशुराम जी के साथ कृष्ण और बलराम किस गुफ़ा से होते हुए गोमन्त पर्वत पर पहुंचे थे। जो पर्वत आकाश से भी ऊंची थी वहाँ तक पहुंचना किसी गुफा के अन्दर प्रवेश कर के कैसे सम्भव है? इसे भी स्पष्ट नहीं किया गया है।
जिन दिनों मैं महाबोधि सोसायटी औफ इण्डिया के द्वारा थाईलैण्ड में आयोजित विपश्यना प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने के लिए थाईलैण्ड गया हुआ था और श्रीलंकाई बौद्ध सन्त पीएस सिवली थेरो के सानिध्य पाने के बाद एक दिन ध्यान में डूबा हुआ था, मुझे ऐसा महसूस हुआ कि कोई शक्ति मुझे धरती के अन्दर से आती हुई प्रकाश की ओर बुला रही है। उस दौरान मैंने जो कुछ भी देखा था उसके बारे में बताने पर लोगों को विश्वास नहीं हुआ। लेकिन उस घटना के बाद मुझे बार-बार द्वीपों से घिरे हुए पर्वत पर युद्धों के दृश्य दिखाई देते थे। इसके कारण लोगों की सलाह पर मुझे नींद की गोली तक लेना पड़ गया था। लेकिन उस दैविक दर्शन को जिसे लोग मेरा स्वप्न कहते थे उसे भुला नहीं सका और उसके रहस्य को जानने के लिए बार-बार योगनिद्रा में डूब कर भ्रमण करता रहा। तीर्थाटन करना और ईश्वरीय प्रेरणा से पौराणिक और उपेक्षित जगहों पर भी घुमना शुरू किया। काफ़ी तलाश करने के बाद एक दिन अचानक पता चला कि गोमन्त पर्वत एक ऐसे मार्ग पर स्थित है जिसके मार्ग में आने वाले कम ऊंचाई की विशालकाय भूमि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद आये जल प्रलय में डूबने से ऊंचाई पर स्थित भू-क्षेत्र कई द्वीपों का रूप धारण कर के थाईलैण्ड, मलेशिया, इण्डोनेशिया, फीलिपिन्स, कम्बोडिया आदि कई द्वीप समूहों वाले देशों के रूप ले चुके हैं। उन्हीं द्वीपों में से पश्चिमी मलेशिया के पूर्वी दिशा में स्थित बोर्नियो नामक द्वीप के उत्तरी भाग में मलेशिया का सबा (Sabah) और सरवाह नामक राज्य है तो दक्षिणी भाग में इण्डोनेशिया का कालिमन्तन नामक राज्य संघ। इसी एक सुदूरवर्ती द्वीप के सबा (Sabah) नामक राज्य में हमारी नजरों से छुपा हुआ था पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित गोमन्त पर्वत।
हरिवंश पुराण की कथा को गौर से पढ़ने और गोमन्त पर्वत के आस-पास के द्वीपों की स्थिति देख कर यह समझते देर नहीं लगा कि जल प्रलय से द्वारका के डूबने के पहले तक वर्तमान थाइलैण्ड, मलेशिया, इण्डोनेशिया आदि द्वीप बन चुके देशों की यात्रा जलयानों का इस्तेमाल किये बगैर अश्वारोही रथ के द्वारा भी किया जा सकता था। इस का संकेत हरिवंश पुराण व महाभारत के उस प्रसंग से मिलता है जब गोमन्त पर्वत की तलहटी में हुए युद्ध में पराजित होकर जरासंध के भागने के बाद चेदिराज दमघोष ने अपने दो रथ श्रीकृष्ण को देते हुए कहा था कि "ये दोनों रथ मैंने तुम्हारे लिए ही बनवाया है। मेरे तरफ़ से इसे स्वीकार करो। मजबूत पहिया, धूरा और कूबर वाले इस रथ में जुते हुए घोड़े दिव्य और तीव्रगामी हैं। इस पर सवार होकर जितनी जल्दी हो सके अपने बन्धुओं के राज्य करवीरपुर में चलो। मृत मनुष्यों के रक्त और शवों की कीच जम जाने से यह क्षेत्र मनुष्यों के रहने लायक नहीं है। अतः जल्द से जल्द यहाँ से वापस चलो।"
जिस तरह बहुमंजिली अट्टालिकाओं वाला द्वारका समुद्र में ७० से १५० फीट नीचे तक डूब कर मिथक बन गया था, उसी तरह द्वारका की ऊंचाई तक विश्व के सभी भू-भाग डूब गये होंगे। इसके कारण द्वारका की तरह कई विश्व की अन्य आबादी भी अपने बन्धु-बान्धवों के साथ डूब कर अपने स्मृतिचिन्हों को मिटा दिये होंगे। पापुआ न्युगिनी और अन्दमान निकोबार जैसे कई द्वीप उसी जल प्रलय के कारण हमारी आधुनिक सभ्यता से कटी-छटी दिखाई देती है। ऐसी ही घटना के कारण गोमन्त पर्वत और उससे जुड़ी यादें हमारे स्मृतियों की धरोहरों के रूप में संचित पौराणिक ग्रन्थों के लेखकों और अनुवादकों की पहुंच से भी दूर हो गये थे। लेकिन उस जल प्रलय में डूबने से बचे हुए ऊँचे-ऊँचे जगहों को एक ही भूमि पर स्थित होने के बावजूद अलग-अलग द्वीपों के रूप में ही सही, मैं उसके अतीत को स्पष्ट देख रहा हूँ। उसी तरह जल प्रलय में डूबने से बचे हुए भौगोलिक साक्ष्यों और बचे हुए प्राचीन जन-जाति के पारम्परिक रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर विलुप्त हो चुके वाणासुर और वरूण के लोक की तरह पहले कार्तिकेय और जलन्धर के बीच हुए युद्ध भूमि और उसके बाद जरासंध और श्रीकृष्ण के बीच हुए युद्ध भूमि वाले गोमन्त पर्वत को भी ढूंढ लिया है।
यह गोमन्त पर्वत है मलेशिया के सबा (Sabah) नामक उस राज्य में जो कालिमन्थन नामक राज्य के पूर्वोत्तर दिशा में स्थित है। कृष्ण और बलराम के द्वारा इस राज्य को रक्त और शव की कीच से पाट कर त्याग दिया गया था। इसके कारण गोमन्त पर्वत के आस-पास की भूमि "शव क्षेत्र" के नाम से कुख्यात होने के कारण आज भी उसी पौराणिक नाम से पहचाना जाता है। जो अपभ्रंश के कारण अब सबा (Sabah) कहलाता है। हालांकि वहाँ के स्थानीय लोग सबाह का अर्थ प्राचीन आत्माओं की भूमि कहते हैं। जो गोमन्त पर्वत की तलहटी में हुए पौराणिक युद्ध स्थल पर मारे गये लाखों लोगों की भटकती हुई आत्माओं वाले नगर की विस्मृत हो चुकी यादों का परिणाम है।
जिस गोमन्त पर्वत पर कृष्ण और बलराम ने भृगुवंशी तपस्वी परशुराम जी की मदद से सुदर्शन चक्र, कौमोदी मूसल, संकर्षण हल, नीलाम्बर और स्वर्ण मुकुट प्राप्त कर के वैष्णव दिव्यास्त्रों का पहली बार संधान किये थे, उनकी याद में गोमन्त पर्वत को वहाँ के स्थानीय लोग "किनाबालु" कहते हैं। जिसका अर्थ स्थानीय लोग प्राचीन आत्माओं की भूमि कहते हैं। मगर मेरे ख्याल से "कृष्णा" के नाम से विख्यात श्रीकृष्ण और बलभद्र, बलराम तथा संकर्षण के नाम से विख्यात "बल" के संयुक्त नाम कृष्णा-बल का अपभ्रंश है मलेशियाई शब्द "किनाबालु"। ऐसा भी हो सकता है कि अपभ्रंशित "किनाबालु" का मूल नाम "कृष्णबल" रखा गया हो। जिसका अर्थ है कृष्ण का बल। यह सच भी है, गोमन्त पर्वत पर आने के बाद ही वसुदेव नन्दन श्रीकृष्ण को दिव्य शक्तियों वाले वैष्णव आयुध प्राप्त हुए थे तथा इसी पर्वत पर भृगुवंशी परशुराम जी ने श्रीकृष्ण में सोयी हुई वैष्णव शक्ति को जगाये थे।
इस वर्णन से यह प्रमाणित नहीं होता है कि "किनाबालु" नामक यह पर्वत गोमन्त पर्वत ही है। लेकिन इसी पर्वत की तलहटी में स्थित जले हुए गुफाओं की स्थिति तथा आदिग्रन्थ महाभारत में वर्णित गोमन्त पर्वत की तलहटी में स्थित गुफाओं और जंगलों में जरासंध की सेना के द्वारा आग लगाने की घटना का वर्णन देखने के बाद यकीन हो जाएगा कि "किनाबालु" नामक पर्वत ही गोमन्त पर्वत है। यदि इस पर भी यकीन न हो तो इस पर्वत के पूर्वोत्तर भाग में स्थित जिस प्राचीन गुफा में सूखे हुए वृक्षों और काष्ठ के टुकड़ों को भरकर आग लगाने से उस पर्वत के प्रश्तर-खण्डों के टूट-टूट कर गिरने के प्रसंग का प्रमाण स्थानीय लोगों में "गोमन्तोंग" के नाम से ही प्रसिद्ध इस गुफा को गोमन्त पर्वत का ही अंग मानने से इंकार नहीं कर पायेंगे। जिस पर्वत की तलहटी में गोमन्तोंग नामक यह गुफा स्थित है उस पर्वत की सबसे ऊंची चोटी वाले "किनाबालु" पर्वत की ऊंचाई और इस चोटी को धारण करने वाले पर्वत की तलहटी का विस्तार भी पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित गोमन्त पर्वत की तरह ही है। इसकी ऊंचाई ४६६० मीटर तथा विस्तार ..... वर्गमीटर है।
मलेशिया के सबा प्रान्त के दक्षिणी दिशा में स्थित जो प्रान्त "कालिमन्थन" के नाम से प्रसिद्ध है, वह संस्कृत शब्द "कालमन्थन" का अपभ्रंश है। सम्भवतः गोमन्त पर्वत के दक्षिणी दिशा में स्थित इसी भूभाग पर जरासंध और श्रीकृष्ण के समर्थकों के बीच महाभारत युद्ध के पहले वाला महायुद्ध हुआ था। इसी स्थल पर जरासंध के गर्व को मथ कर भागने के लिए विवश किया गया था। उस युद्ध के पहले हुए सागर मन्थन का स्थान भी कालिमन्थन की यही भूमि रही हो। इस मामले में सच्चाई क्या है, उसका पता लगाने के लिए और शोध की आवश्यकता है।
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Prehistoric_Malaysia



कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें