सोमवार, 15 अप्रैल 2024

कुम्भी जाति और बड़गायां का अर्थ


कौन हैं कुम्भी बारी, कम्मा बारी और बड़गायां परिवार के नाम से प्रसिद्ध कौशिक गोत्रीय समाज? 


कुम्बी के नाम से प्रसिद्ध था पौराणिक अफ़्रीका महाद्वीप

 बारी, बड़गायां, बड़गामा, बर्लिन, बर-एइली (बरैली), ब्राज़ील और बर्जिनिया जैसे नाम आपने भी सुना होगा। ये नाम विभिन्न देशों, राज्यों और नगरों के नाम भले ही हैं, लेकिन ये अपनी बहादुरी और सम्पन्नता के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध कौशिक और कौशिक गोत्रीय कुम्भी बैस कहलाने वाले सबसे प्राचीन राजवंश के वंशज़ों की जाति- "बारी जाति" के सूचक हैं। इसके कारण कौशिक गोत्रीय लोगों की एक जाति दक्षिणी भारत में कम्मा वारु के नाम से तो यूरेशिन देशों में Cossacks and Comers के नाम से आज भी प्रसिद्ध हैं। यही जाति मलय देश के नाम से प्रसिद्ध वर्तमान देश इण्डोनेशिया के बाली और जावा नामक द्वीपों सहित मलेशिया के पूर्वी राज्यों, उत्तर भारतीय राज्योंं, अफ़्रीकी देशों - घाना, मौरितानिया, केन्या, जिम्बाब्वे और नाइजीरिया सहित विभिन्न आस्ट्रेलियाई देशों में भी कहीं पर कुम्भी तो कहीं पर कुम्बी कहलाती है। 


इसी इण्डोनेशियाई द्वीप के पश्चिमी तट पर रहने वाले कौशिक गोत्रीय ब्राह्मण परिवार के चार ब्राह्मणों को सह्याद्रि के तटवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले नम्बूदरी ब्राह्मणों ने बुला कर बौद्ध धर्म और जैन धर्म के कारण विलुप्त हो रहे सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु बसाया था। बाद में कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों के साथ अपनी बेटियों का विवाह करवा कर सह्याद्रि की जो तटवर्ती भूमि दान कर दिया वह कौशिक-कोड नामक एक प्रसिद्ध व्यापारिक बन्दरगाह बना था। दक्षिणी भारत में आने वाले विधर्मियों के द्वारा जब नम्बूदरी ब्राह्मणों को परेेशान किया जाने लगा तब जावा से बुला कर बसाये गये चारों ब्राह्मणों के वंशज़ों को भी सैन्य सहायता के लिये आमंत्रित किया गया था। लेकिन सुदूरवर्ती क्षेत्र से बार-बार आना सम्भव नहीं था। इसके कारण नम्बूदरी ब्राह्मणों ने दामाद बनाये गये कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों के साथ मिलकर यह निर्णय लिया कि उनके वंश में उत्पन अगला सन्तान पुत्र हो या पुत्री वह क्षत्रिय होगा। उसमें ब्राह्मणोचित संस्कारों के साथ क्षत्रिय संस्कार की भी शिक्षा दी जाएगी। जो हम लोगों का राजा बनेगा। निर्णय के अनुसार उन ब्राह्मणों के वंश में प्रथम उत्पन्न जो सन्तान राजा बना वह पेरुमल कहलाया। उस राजा के वंश में उत्पन्न चेर नामक राजा के नाम पर उनका राज्य भी चेर राजवंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में इस वंश में उत्पन्न केरल नामक राजा के नाम पर चेर राज्य का नाम केरल हो गया। बाद में इसी वंश में उत्पन्न चोल नामक व्यक्ति को सरदार बना कर पेरुमल का सम्मान दिया गया। उनके बाद चेर राज्य के राजवंश में ही उत्पन्न पाण्ड्य नामक युवक को जब पेरुमल बनाया गया तब उनकेे वंशज़ पाण्ड्य कहलाये। ये सभी एक ही वंश से उत्पन्न कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों के वंशज़ हैं। पूर्वी तट पर रहने वाले एक राजा ने जब इनके क्षेत्र में घुस कर बार-बार लूटपाट करने लगा तब इन लोगों ने इण्डोनेशिया के पश्चिमी तटों पर रहने वाले सरदारों को बुला लिया और इस शर्त पर पूूर्व तट के राजा पर आक्रमण किये कि उस राजा का एक किला इण्डोनेशिया से आने वाले सरदारों को भी दिया जाएगा तथा शेष राज्यों सहित अपने राज्य को भी अपने वंशज़ों में बांट दिया जाएगा। शर्तानुसार कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों ने दक्षिणी राज्यों को आपस में बांट लिया जो चेर, चोल और पाण्ड्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। लेकिन बाद में आपसी विवाद के कारण इनकी शक्ति जब क्षिण हो गई तब पड़ोसी शासकों के दरबार में मन्त्री और सरदारी का काम करने लगे। काकतीय साम्राज्य और विजयनगर साम्राज्य में भी यही करते रहेे। मगर मुगलकाल में जिन कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों को बिहार में जाकर शरण लेना पड़ा उनके वंशज़ आज भी बड़गायां वाले कुम्भी बैस वंशीय क्षत्रिय कहलाते हैं। कुुम्भी कहलाने वाले इसी वंश के दक्षिण भारतीय लोग अपने समुदाय को कम्मा कहते हैं तो पश्चिमोत्तर भाारतीय लोग कुमावत कहते हैं। जबकि इसी वंंश की एक शाखा कहींं पर कोमी और कुम्बी कहलाती है तो कहीं पर कुम्बरा भी कहलाती है। हालांकि कुछ लोग कम्बोज़ को भी कुम्भी समुदाय की ही जाति समझते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। क्योंकि कौशिक विश्वामित्र और वशिष्ठ के मध्य होने वाले युद्ध के दौरान कम्बोज़ जाति के लोगों ने कौशिक विश्वामित्र जी के विरुद्ध वशिष्ठ जी का साथ देने वाले लोग थे। जबकि कुम्भी जाति का सम्बन्ध कौशिक विश्वामित्र, भगवान शिव और विष्णु भगवान के भक्त प्रह्लाद के द्वितीय पुत्र कुम्भ के वंशज़ों से है। इस तरह से कुम्भी और कम्बोज़ दोनों अलग-अलग जातिय समुदाय के नाम हैं। 

 कौशिक गोत्रीय कुम्भी जाति का मुख्य कार्य था धर्म रक्षार्थ यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठान करना, जन-जीवन हेतु जरूरी संसाधनों की व्यवस्था करना और संकट ग्रस्त लोगों की सहायता करने के लिए विश्व के सभी राज्यों से राजस्व की वसूली करना। अपने शौर्य के बदौलत युद्ध, विज्ञान, कला, साहित्य और व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले कौशिक गोत्रीय लोगों के पूर्वज़ भी ब्रह्मदेव के पुत्र ब्रह्मर्षि भृगु के ही वंशज़ हैं। इसके कारण भृगु ऋषि के ज्येष्ठ पुत्र शुक्राचार्य जी के वंश में उत्पन्न कौशिक विश्वामित्र और भृगु ऋषि के कनिष्ठ पुत्र च्यवन ऋषि के वंश में उत्पन्न जमदग्नि ऋषि को भी बाल्मीकि रामायण में भार्गव कहा गया है। उन भृगुवंशियों की ही कुछ जाति बार्गी तो कुछ जातिय समुदाय बरगइयां कहलाती है। जबकि "बड़गायां का मूल अर्थ है बड़ा देव के गाँव के लोग। विदित हो कि छत्तीसगढ़, आन्ध्रप्रदेश और मध्यप्रदेश सहित उसके सीमावर्ती क्षेत्रों के जन जातिय लोगों में भगवान शिव! बड़ा देव के नाम से पूजे जाते हैं। सभी देवी-देवताओं में सर्वश्रेष्ठ और सबसे बड़े होने के कारण महादेव के नाम से भी विख्यात शिव जी के गाँव के लोगों को भी बड़गायां बन्धु कहा जाता है। विशेष रूप से कौशिक विश्वामित्र भगवान की अनुज (सबसे छोटी) पत्नी चक्षुस्मति देवी के पुत्र गृहपति अग्नि देव के वंशज़ों को। क्योंकि शिव जी के गणों में शामिल होते ही कौशिक विश्वामित्र भगवान! नागकन्या चक्षुस्मति देवी और अपने पुत्र के साथ उस दौरान शिव लोक में जाकर बस गये थे जब बाणासुर को दिये गये अपने वचन को निभाने के लिए महादेव शिव जी! बाण लोक में जाकर रहने लगे थे। उस बाण लोक और पौराणिक मन्दार गिरी के निकट कुम्भ लोक में स्थित शिव जी का गाँव होने का संकेत आज भी दिखाई देता है। एक तरह से आज का सम्पूर्ण अफ्रीका महादेव ही कुम्भ देश था; जिसका वहाँ के स्थानीय भाषा में अर्थ सजीला होता है। इसका तात्पर्य यह है कि अफ्रीका का यह महादेश किसी जमाने में सजे-संवरे और खुशहाल लोगों का देश था। संहारक शक्तियों के स्वामी शिव और उनके गणों के प्रति समर्पित भृगुवंशी! बारी के नाम से भी पहचाने जाते थे। 


भारत में ही यह जाति कहीं पर बारी ब्राह्मण कहलाती है, तो कहीं पर बारी बैस। यही नहीं कुछ जगहों पर "बारी" एक जन जाति के नाम से भी पहचानी जाती है। जबकि इटली, माली, सोमालिया, रूस, मलेशिया और औस्ट्रेलिया आदि देशों में बारी नामक राज्यों और नगरों के भी होने का पता चलता है। इन्हें संलग्न तस्वीरों में देख सकते हैं। 

🖼️

कौशिक गोत्रीय बारी ब्राह्मणों के द्वारा इटली के दक्षिण-पूर्वी भाग में बसाया गया राज्य "बारी"


दरअसल बारी, बरैली, ब्रज, ब्राजील, बर्जिनिया आदि भौगोलिक क्षेत्रों के नामकरण वहाँ की मूल जाति के नाम पर ही पड़ा है। भारत, अमेरिका, औस्ट्रेलिया और अफ्रीका में रहने वाले अल्पसंख्यक कौशिकों को देखने के बाद रूस, चेकोस्लोवाकिया, यूक्रेन, अजर्बैज़ान, फ्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल और मिश्र में रहने वाले कौशिकों तथा उनकी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का इतिहास देखने पर आपको यकीन हो जाएगा कि वहाँ की मूल सभ्यता कौशिक गोत्रीय लोगों की जाति की ही सभ्यता है। अर्थात् रूस को आबाद करने वाले लोगों का मूल निवास स्थान कजाख़स्तान के आस-पास का क्षेत्र है। लोक कथाओं तथा ऐहासिक साक्ष्यों के अनुसार भी बारी और बड़गायां कहलाने वाले लोग युद्ध प्रिय कौशिक ब्राह्मणों की जाति हैं। यही लोग कौशेक, कोज़ख और कजाख़ भी कहलाते हैं। रोमन साम्राज्य के मुख्य केन्द्र के रूप में पहचाना जाने वाला विजयन्तियम् नामक जो नगर पहले रोमन साम्राज्य के पूर्वी भाग की राजधानी थी उसे बसाने वाले लोग भी बारी ब्राह्मणों की ही जाति के थे। बाद में इन्हीं विजयन्तियम् के बारी ब्राह्मणों ने संयम और चतुराई के कारण सम्पूर्ण रोमन साम्राज्य को अपने अधिकार में लेकर सम्पूर्ण रोमन साम्राज्य का नाम बदल कर विजयन्तियम् कर दिया था। इस साम्राज्य का विस्तार करने वाले कौशिक गोत्रीय बारी ब्राह्मणों के जिस वंश ने उत्तर भारतीय क्षेत्र से जाकर मार्मरा और एजीएन सी (अग्नि सागर) के पास विजयन्तियम् नामक उपनिवेश को स्थापित किया था, उनका साम्राज्य अपने समय का सबसे शक्तिशाली और विशाल साम्राज्य बन गया था। जिस जगह पर ब्राह्मणशाही क्षत्रिय कहलाने वाले कौशिक गोत्रीय राजा पोरस के बेटों जय और विजय में से विजय पोरस (Main General ccommander of Roman empire later called the Byzantium Emparor Singhbaahu Vijay Porsche) नामक पुत्र ने विजयन्तियम् नामक एक नगर बसा कर विजयन्तियम् साम्राज्य की नींव रखा था, उसी जगह पर विजय पोरस का साथ देने वाले बारी ब्राह्मणों से आबाद एक गाँव बड़गामा के नाम से आज भी स्थित है। हालांकि वह गाँव आज महानगर का रूप ले लिया है, लेकिन अपने वैभवशाली इतिहास की स्मृतियों को आज भी अपने ऐतिहासिक संग्रहालयों, ध्वस्त खण्डहरों और सड़कों के किनारों पर यत्र-तत्र दिखने वाले विशालकाय दीवारों में समेटे हुए है। 

🏚️🏛️

बारी ब्राह्मणों का बड़गामा नामक गाँव और विजय पोरस द्वारा स्थापित विजयन्तियम् नामक नगर के अवशेष के पास स्थित स्मारक बिजंटाइन सीटी वाल की तस्वीर


🏚️

इस्ताम्बुल के कुमलुक में राजमार्ग के किनारे स्थित विजयन्तियम् साम्राज्य के ऐतिहासिक दीवारों की तस्वीर



तुर्की के इस्ताम्बुल में बॉस-पोरस" नामक एक ऐतिहासिक स्थान जो मारमरा सागर से होते हुए कैस्पियन सागर को जल डमरूमध्य से जोड़ने वाला मुख्य बन्दरगाह है, जिसका नामकरण मद्र देश के राजा पोरस के नाम पर उनके पुत्र विजयपोरस (Vijay Porsche) ने रखा था। सिकन्दर और उसके प्रधानमंत्री सेल्यूकस की मृत्यु के बाद रोमन साम्राज्य की बागडोर सिंहबाहु विजय पोरस ने अपने हाथ में ले लिया था। विदित हो कि सिकन्दर की तरह विजय पोरस भी कौशिक गोत्रीय बारी ब्राह्मण ही थे। उनके पहले दक्षिणी तूर्की के कुश्तुन्तुनियां (इस्ताम्बुल) में -४५४ ईसा पूर्व आये यूनानी लेखक हेरोडोटस! जिनका संस्कृत नाम हरिदत्त था, वे भी कौशिक गोत्रीय बारी ब्राह्मण ही थे। कहते हैं कि हरिदत्त को उनके राज्य से ३२ वर्ष की आयु में निर्वासित कर दिया गया था। इसके कारण वे भटकते हुए पर्सियन साम्राज्य के सुषा नामक उस नगर में आकर रहने लगे थे जिसे वेदों में वर्णित महर्षि भृगु की जन्मस्थली कहा गया है। सुषा के दक्षिणी दिशा में ही उर नामक वह नगर स्थित था, जहां की अप्सरा पौराणिक कथाओं में उर्वशी के नाम से प्रसिद्ध थी। विदित हो कि बारी ब्राह्मण! ब्रह्मर्षि भृगु भगवान के वंशज़ों को कहा जाता है तो बड़गायां! भी भृगुवंशियों के लिए प्रयुक्त नाम भार्गवों से आबाद गाँव को कहा जाता है। भृगु ऋषि के पौत्र अत्रि ऋषि के वंशज़ों के कई समुदाय के लोग अत्रिबारी (Atribari) तो अत्रि ऋषि के पौत्र बुध भगवान के वंशज़! बुध भगवान की पत्नी इला के नाम पर इल्बारी कहलाते हैं। जिससे यह प्रमाणित होता है कि बारी जाति भृगुवंशी कहलाने वाले भार्गवों की ही जाति है। 


🏚️🖼️🏚️

पर्सियन साम्राज्य के सुषा (Susa) नामक नगर का नक्शा

⛩️

पर्सियन साम्राज्य के उर (Ur) नामक नगर का नक्शा

विजयन्तियम् साम्राज्य की बर्बादी का कारण प्लेग की महामारी और उस बिमारी के थमने के बाद मुस्लिम आक्रान्ताओं के हमलों को बताया जाता है जबकि असली कारण गृह युद्ध था। उस दौरान विजय पोरस के वंशज़ों के जिन कबिलों के लोग दक्षिण भारतीय राज्यों में रहते हुए व्यापारिक कार्यों का संचालन कर रहे थे, वे लोग अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए स्थानीय शासकों की सेना में सम्मिलित होकर राजस्व वसूली व मालगुजारी का कार्य करने लगे थे। इस दौरान कई सरदारों ने स्वतंत्र राज्य भी स्थापित कर लिये थे। ऐसे ही लोगों में एक राजा थे पजवन देव जो पजोन जी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके बारे में विस्तृत जानकारी संलग्न लिंक पर देख सकते हैं।https://kaushikwarriors.blogspot.com/2021/03/blog-post.html




आप सोच रहे होंगे कि मैंने चर्चा शुरू किया था महर्षि भृगु और कौशिक विश्वामित्र भगवान के बारे में और चर्चा किसी और की करने लगा। लेकिन ऐसी बात नहीं है मैं आपको उसी विषय पर ले जा रहा हूँ जिसकी जानकारी के लिए आप इस ब्लॉग पर आये हैं। मद्र देश की सिंहपूरा नामक राजधानी के निवासियों के द्वारा तूर्की में आबाद बड़गामा नामक एक प्राचीन गाँव के बारे में ऐसी मान्यता है कि वह गाँव ५००० वर्षों से भी अधिक पुराना है। दक्षिणी भारत में स्थित काकतीय साम्राज्य और महिष्मति साम्राज्य के इतिहास में भी उत्तरी भारत में स्थित सिंहपुरा नामक एक ऐसे राज्य का जिक्र किया गया है जिसका अफ्रीकी निवासियों के साथ गहरा सम्बन्ध था। दरअसल ये अफ्रीकी लोग पौराणिक युग में कुम्भ (कुम्ब) लोक के नाम से विख्यात अफ्रीका के उस देश के निवासी थे जो ईसा पूर्व कुश देश का ही भाग था। चोल साम्राज्य के दौरान भी इन लोगों का अफ्रीका में रहने वाले कौशिक गोत्रीय कुम्भी (कुम्बी) बैस कहलाने वाले लोगों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था। 


महर्षि भृगु का जन्म २.५ लाख ईसा पूर्व ब्रह्मलोक-सुषा नगर (ईरान) में हुआ था। ये आदि ब्रह्मा प्रचेता और मारिषा के पुत्र तथा अपने माता-पिता के सहोदर दो भाईयों में छोटे भाई थे। इनके बड़े भाई अंगिरा ऋषि थे। जिनके पुत्र बृहस्पति! कच और भारद्वाज के पिता तथा देवगणों के गुरु थे। तब भृगु ऋषि के पुत्र शुक्राचार्य जी दैत्यों के गुरु और अत्रि ऋषि के पिता थे। भगवान भृगु ऋषि ने हिमालय के भृृगुप्रश्रवण नामक स्थान पर विश्व का पहला ज्योतिषिय ग्रन्थ "भृगु संहिता" की रचना किये थे। कई जगहों पर भार्गव संहिता के नाम से भी विख्यात इस ग्रन्थ के लोकार्पण तथा गंगा और सरयू नदि के संगम के अवसर पर जीवनदायिनी गंगा नदी को संरक्षण देने के लिए याज्ञिक परम्परा से महर्षि भृगु ऋषि के द्वारा अपने शिष्य दर्दर के सम्मान में शुरू किये गये "ददरी मेला" का भी उल्लेख किया गया है। 


🏚️

दिव्या पौलोमी भार्गव मन्दिर



महर्षि भृगु :

महर्षि भृगु की दो पत्नियों का उल्लेख आर्ष ग्रन्थों में मिलता है। इनकी पहली पत्नी दैत्यों के अधिपति हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या थी। जिनसे इनके दो पुत्रों क्रमशः काव्य-शुक्र और त्वष्टा-विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। सुषानगर (ब्रह्मलोक) में पैदा हुए महर्षि भृगु के दोनों पुत्र विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। बड़े पुत्र काव्य-शुक्र खगोल ज्योतिष और यज्ञ कर्मकाण्डों के निष्णात विद्वान हुए। मातृकुल दैत्य वंशियों में इन्हें आचार्य की उपाधि मिली। ये शिव जी के उदर में रहते हुए मृतसंजीवनी मन्त्र की दीक्षा लेकर शिवजी के शुक्र मार्ग से बाहर आने के कारण शुक्र के नाम से प्रसिद्ध हुए तथा सम्पूर्ण संसार में शुक्राचार्य के नाम से विख्यात हुए। भृगु ऋषि के दूसरे पुत्र त्वष्टा-विश्वकर्मा वास्तु के निपुण शिल्पकार हुए। मातृकुल दैत्यवंश में इन्हें ‘मय’ के नाम से जाना गया। अपनी परम्परागत शिल्प दक्षता से ये भी जगत में विख्यात हुए।


महर्षि भृगु की दूसरी पत्नी दानवों के अधिपति पुलोम ऋषि की पुत्री पौलोमी थी। इनसे भी उन्हें एक पुत्र च्यवन और एक पुत्री (...?) का जन्म हुआ था। च्यवन ऋषि का विवाह मुनिवर भृगु ऋषि ने खम्भात की खाड़ी में स्थित भड़ौंच (गुजरात) के राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से किया। राजा शर्याति को पुत्र नहीं था, इसके कारण भार्गव च्यवन और सुकन्या के विवाह के साथ ही भार्गवों का हिमालय के दक्षिणी क्षेत्र में पदार्पण हुआ। च्यवन ऋषि खम्भात की खाड़ी के राजा बने और इस क्षेत्र को भृगुकच्छ और भृगु क्षेत्र के नाम से पहचाना जाने लगा। इस घटना की स्मृति में आज भी च्यवन ऋषि के राज्य क्षेत्र भड़ौच में नर्मदा नदी के तट पर बनवाया हुआ प्राचीन भृगु मन्दिर स्थित है। यहीं पर च्यवन ऋषि ने देवी सुकन्या के गर्भ से अपने पिता की तरह ही ब्रह्म तेज़ से युक्त एक विद्वान पुत्र ऋचिक को जन्म दिये थे, जो ब्रह्म तेज़ से आलोकित होने के कारण और्व के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसी और्व ऋषि के नाम पर सूषा नगर और उर पुर से लेकर सम्पूर्ण कुश द्वीप की भूमि अरब के नाम से पहचाना जाने लगा। यही कारण है कि आज भी सभी अरबियन देशों में वैदिक काल के अवशेष दिखाई देते हैं। 


🏚️

भृगु मन्दिर की तस्वीर

च्यवन ऋषि के पुत्र ऋचीक (और्व) का विवाह भृगु ऋषि ने मघवा और महेन्द्र के नाम से विख्यात कौशिक गाधि की पुत्री सत्यवती काली के साथ एक हजार श्यामकर्ण घोड़े दहेज में देकर किया था। कौशिक गाधि की पुत्री होने के कारण सत्यवती काली! कौशिकी के नाम से भी प्रसिद्ध हुई। इनके साथ अपनी पुत्री का विवाह करने पर भार्गव ऋचीक को हिमालय के दक्षिण में स्थित राजा गाधि के राज्य क्षेत्र गाधिपुरी में भी कुछ भूमि प्राप्त हुआ, जो कोसी नदी से सींचित भूक्षेत्र में स्थित है। वे क्षेत्र वर्तमान में नेपाल और बिहार में स्थित है। जबकि कुछ लोग ऋचिक ऋषि को दी गई भूमि उत्तर प्रदेश के वर्तमान बागी बलिया को बताते हैं।


महेन्द्र गाधि ने अपनी पुत्री और दामाद बने ब्रह्मर्षि ऋचिक को उपहार के रूप में जो भूमि दिये थे वह कर (राजस्व) मुक्त होने के कारण विमुक्त क्षेत्र कहलाया। इस विमुक्त क्षेत्र में भृगु ऋषि के आने के कई कथानक आर्ष ग्रन्थों में मिलते हैं। पौराणिक, ऐतिहासिक आख्यानों के अनुसार प्रचेता के नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु ऋषि के द्वारा हिमालय के दक्षिणी दिशा में रहने वाले दैत्य, दानव और मानव जातियों के राजाओं के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर मेलजोल बढ़ाने से हिमालय के उत्तरी दिशा में रहने वाले देव, गन्धर्व, यक्ष जातियों के नृवंशों में आक्रोश पनप रहा था। जिससे सभी लोग देवों के संरक्षक ब्रह्माजी के परपौत्र विष्णु को दोष दे रहे थे। दूसरे बारहों आदित्यों में भार्गवों का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा था। इसी बीच ब्रह्मर्षि भृगु के श्वसुर दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने हिमालय के उत्तर के राज्य हरिवंशपुर (चीन) पर चढ़ाई कर दिया। जिससे महर्षि भृगु के परिवार में विवाद होने लगा। महर्षि भृगु यह कह कर कि राज्य सीमा का विस्तार करना राजा का धर्म है, अपने श्वसुर का पक्ष ले रहे थे। इस विवाद में विष्णु जी ने लक्ष्मी सेे मिलनेे आयी भृृगु ऋषि की पहली पत्नी हिरण्यकशिपु नन्दिनी (पुत्री) देवी दिव्या को मार डाला। इससे क्रोधित होकर महर्षि भृगु ने अपने दामाद श्री विष्णु जी से सम्बन्ध खत्म कर लिये। भृगु ऋषि के द्वारा विष्णु को अपमानित कर के त्याग देने की घटना ही ग्रन्थों में भृगु ऋषि के द्वारा विष्णु को लात मारना कहलाता है। 


इस विवाद का निपटारा महर्षि भृगु के छोटे भाई और विष्णु जी के दादा मरीचि मुनि ने इस निर्णय के साथ किया कि भृगु हिमालय के दक्षिणी भाग में जाकर रहें। उनके दिव्या देवी से उत्पन्न पुत्रों के सम्मान सहित पालन-पोषण की जिम्मेदारी देवगण उठायेंगे। परिवार की प्रतिष्ठा-मर्यादा की रक्षा के लिए भृगु जी को यह भी आदेश मिला कि वे श्री हरि विष्णु की आलोचना नहीं करेंगे। इस प्रकार महर्षि भृगु सुषानगर (सुमेरिया/पर्शिया/ ईरान) से अपनी दूसरी पत्नी पौलोमी को साथ लेकर अपने छोटे पुत्र ऋचीक के पास गाधिपुरी (वर्तमान बलिया और गाजीपुर का इलाका) में आ गये।


महर्षि भृगु के इस क्षेत्र में आने का दूसरा आख्यान कुछ धार्मिक ग्रन्थों, पुराणों में भी मिलता है। देवी भागवत के चतुर्थ स्कन्ध, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण और श्रीमद्भागवत के विभिन्न खण्डों में बिखरे वर्णनों के अनुसार महर्षि भृगु प्रचेता नामक उस ब्रह्मा के पुत्र हैं, जो सुमेरु पर्वत पर वास करते हैं। भृगु ऋषि का विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्री ख्याति से हुआ था। जिनसे इनके दो पुत्र काव्य-शुक्र और त्वष्टा तथा एक पुत्री ‘श्री’ लक्ष्मी का भी जन्म हुआ था। इनकी पुत्री ‘श्री’ का विवाह श्री हरि विष्णु से हुआ। दैत्यों के साथ हो रहे देवासुर संग्राम में महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति जो योगशक्ति सम्पन्न तेजस्वी महिला थी। वह दैत्यों की सेना के मृत सैनिकों को अपने योगबल से जीवित कर देती थी। जिससे नाराज होकर श्रीहरि विष्णु ने शुक्राचार्य की माता, भृगुजी की पत्नी ख्याति का सिर अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया था। अपनी पत्नी की हत्या होने की जानकारी होने पर महर्षि भृगु भगवान ने विष्णु को शाप देते हुए कहा था कि तुम्हें स्त्री के पेट से बार-बार जन्म लेना पड़ेगा। उसके बाद महर्षि अपनी पत्नी ख्याति को अपने योगबल से जीवित कर के सुमेरु के नाम से प्रसिद्ध पर्वतराज हिमाचल की बेटी गंगा के तट पर स्थित क्षेत्र में चले गए और वहीं पर तमसा देवी को जन्म दिये। अर्थात तमसा नदी की सृष्टि किये।


पद्म पुराण के उपसंहार खण्ड की कथा के अनुसार मन्दराचल पर्वत पर हो रहे यज्ञ में ऋषि-मुनियों में इस बात पर विवाद छिड़ गया कि त्रिदेवों (ब्रह्मा-विष्णु-शंकर) में श्रेष्ठ देव कौन है? देवों की परीक्षा के लिए ऋषि-मुनियों ने महर्षि भृगु को परीक्षक नियुक्त किया था।


त्रिदेवों की परीक्षा लेने के क्रम में महर्षि भृगु सबसे पहले भगवान शंकर के कैलाश (हिन्दूकुश पर्वत श्रृंखला के पश्चिमी भाग में स्थित कोह सुलेमान जिसे अब ‘कुराकुरम’ कहते हैं) पहुंचे, उस समय भगवान शंकर अपनी पत्नी सती के साथ विहार कर रहे थे। नन्दी आदि रूद्रगणों ने महर्षि को प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया। इनके द्वारा भगवान शंकर से मिलने की हठ करने पर रूद्रगणों ने महर्षि को अपमानित भी कर दिया। कुपित महर्षि भृगु ने भगवान शंकर को तमोगुणी घोषित करते हुए लिंग रूप में पूजित होने का शाप दिया।


यहाँ से महर्षि भृगु ब्रह्मलोक (सुषानगर, पर्शिया, ईरान) में ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी अपने दरबार में विराज रहे थे। सभी देवगण उनके समक्ष बैठे हुए थे। भृगु जी को ब्रह्माजी ने बैठने तक को नहीं कहे। तब महर्षि भृगु ने ब्रह्माजी को रजोगुणी घोषित करते हुए अपूज्य (जिसकी पूजा ही नहीं होगी) होने का शाप दिया। कैलाश और ब्रह्मलोक में मिले अपमान-तिरस्कार से क्षुभित महर्षि विष्णुलोक चल दिये।


भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीर सागर (श्रीनार फारस की खाड़ी के पास स्थित बन्दी-रमा नामक स्थान पर स्थित पहाड़ी (शेषनाग) पर अपनी पत्नी श्री लक्ष्मी देवी के साथ विहार कर रहे थे। उनसे मिलने की इच्छा जताने पर विष्णु के सेवकों ने बताया कि अभी वे सो रहे हैं। इस पर वे विष्णु जी के जागने का इन्तजार करने लगे। लेकिन काफ़ी समय तक इन्तजार करने पर भी जब विष्णु जी ने उनकी ओर नहीं देखा तो महर्षि भृगुजी को लगा कि हमें आया हुआ देख कर ही विष्णु सोने का नाटक कर रहे हैं। इस अपमान से उन्हें अपनी पहली पत्नी हैरण्य दिव्या देवी की विष्णु के द्वारा हत्या करने की घटना याद आ गई। 


अपने दामाद के द्वारा किये जा रहे तिरस्कार से क्रोधित होकर भृगु ऋषि ने अपने दाहिने पैर का आघात श्री विष्णु जी की छाती पर कर दिया। महर्षि के इस आचरण पर उनकी पुत्री लक्ष्मी जो श्रीहरि के चरण दबा रही थी कुपित हो उठी। कहते हैं कि इस घटना से क्षुब्ध हुए श्रीविष्णु जी ने महर्षि का पैर पकड़ लिया और शापित होने के भय से अपनी भूल के लिए माफ़ी माँगते हुए कहा कि हे भगवन्! मेरे कठोर वक्ष से आपके कोमल चरण में चोट तो नहीं लगी। इससे सन्तहृदयी महर्षि भृगु अपने व्यवहार से लज्जित तो हुए ही उनका क्रोध भी शान्त हो गया। अपने दामाद में हुए इस हृदय परिवर्तन से प्रसन्न होकर उन्होंने श्रीहरि विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ और सतोगुणी घोषित कर दिया। 


ब्रह्मर्षि भृगु जी के द्वारा लिए गए त्रिदेवों की इस परीक्षा में जहाँ एक बहुत बड़ी सीख छिपी हुई है। वहीं वेदों को विभाजित कर के पुराणों की रचना करने वालों ने निर्दोष भृगु ऋषि की छवि को खराब करने के लिए जानबुझ कर कुछ ऐसे आख्यान गढ़ दिये जिससे भृगुवंशियों को नीचा दिखाया जा सके। इसमें लेखकों की बहुत बड़ी कूटनीति भी छिपी हुई थी। अपने उपेक्षा करने वाले को भी क्षमा कर देने वाले भृगु की छवि खराब करने के लिए इनकी लोकप्रियता से जलने वालों ने एक कहावत रच दी - 

क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।

का हरि को घट्यो गए, ज्यों भृगु मारि लात।।

इस घटना में कूटनीति यह थी कि हिमालय के उत्तर के नृवंशों का संगठन बनाकर रहने से श्री हरि विष्णु के नेतृत्व में सभी जातियां सभ्य, सुसंस्कृत बन उन्नति कर रही थी। वहीं हिमालय के दक्षिण का नृवंश समुदाय जिन्हें दैत्य-दानव, मरूत-रूद्र आदि नामों से जाना जाता था। परिश्रमी होने के बाद भी असंगठित, और असभ्य जीवन जी रही थी। ये जातियां रूद्रगणों और शंकर को ही अपना नायक-देवता मानती थी। उनकी ही पूजा करती थी। हिमालय के दक्षिण में आदित्यों के नायक श्रीविष्णु को प्रतिष्ठापित करने के लिए महर्षि भृगु ही सबसे उपयुक्त माध्यम थे। उनकी एक पत्नी दैत्यकुल से थी, तो दूसरी दानव कुल से थी और उनके पुत्रों शुक्राचार्य-अत्रि, त्वष्टा-मय-विश्वकर्मा तथा भृगुकच्छ में च्यवन तथा गाधिपुरी (भारत के उत्तर प्रदेश में स्थित गाजीपुर-बलिया का क्षेत्र) में ऋचीक (और्व) का बहुत मान-सम्मान था। इस त्रिदेव परीक्षा से हिमालय के दक्षिणी भाग में रहने वाले भृगुवंशियों की सहायता से श्रीहरि विष्णु की प्रतिष्ठा स्थापित होने लगी। विशेष रूप से राजाओं के अभिषेक में श्री विष्णु का नाम लिया जाने लगा। भार्गवों की सहायता और आशिर्वाद से हिमालय पार के सूर्य, मङ्गल और शनि आदि देवों को प्रभुत्व और सम्मान (मान्यता) दिया जाने लगा।


पुराणों में वर्णित आख्यान के अनुसार त्रिदेवों की परीक्षा में विष्णु जी के वक्ष पर पद प्रहार करने वाले महर्षि भृगु को दण्डाचार्य मरीचि ऋषि ने पश्चाताप करने के लिए अनवरत यात्रा (उदासीन यात्रा) करने की सजा सुनाते हुए बाँस की एक छड़ी देकर यह निर्देश दिया कि जिस धरा पर इस बाँस की छड़ी में कोंपले फूट पड़े और आपके कमर से मृगछाल पृथ्वी पर गिर पड़े, उसी धरा को सबसे पवित्र मान कर प्रवास करेंगे और वहीं पर विष्णु सहस्त्रनाम का जप करेंगे तब ही आप अपने पूर्व पद पर पुनः आसीन होंगे और आपके इस पाप का मोचन होगा। 


अपने धाम को त्याग कर अनिश्चित और अज्ञात धाम की तलाश में महर्षि भृगु भगवान के द्वारा आरम्भ की गयी यही यात्रा उदासीन यात्रा कहलाया। त्रेता युग में प्रभु श्री रामचन्द्र जी को भी उदासीन यात्रा के लिए जाना पड़ा था। वनवास के लिए अयोध्या को छोड़ते समय अनिश्चित गंतव्य की ओर प्रस्थान करने के समय की स्थिति का उल्लेख करते हुए संत तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है "तापस वेश सुवेश उदासी, चौदह वरष राम वनवासी।।" अर्थात् उदासी तपस्वी की तरह सुन्दर वेश धारण कर के प्रभु श्री रामचन्द्र जी को चौदह वर्षों तक वन में ही वास करना होगा। उदासी पन्थ के अनुयायी अपने घर, परिवार और समाज से कटे होने पर भी धर्म का त्याग नहीं करने वाले लोग होते हैं जो। भूमिहीन और बेघर होकर अपनी मूल भूमि से विस्थापित होकर भी धर्म का परित्याग नहीं करने वाले लोग होते हैं। अतः ऐसे लोग सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोगों के लिए पूजनीय होते हैं। 


उदासीन होने के लिए मन्दराचल से चलते हुए जब महर्षि भृगु विमुक्त क्षेत्र (वर्तमान बलिया जिला उत्तर प्रदेश) के गंगा तट पर पहुँचते ही उनकी छड़ी में कोंपले फूट पड़ी। इससे वे समझ गए कि अब उनकी यात्रा रुकने वाली है। संयोगवश एक दिन गङ्गा नदी के किनारे स्थित वन में विचरण करने के दौरान उन्हें जोरों की प्यास लगी। नदी के जल से प्यास बुझा कर जैसे ही वहाँ से प्रस्थान करना चाहे कमर में बँधी हुई उनकी मृगछाला ढ़िली होकर भूमि पर गिर गई। इससे वे समझ गए कि इसी जगह पर हमें प्रवास करना है। फिर वे गङ्गा नदी के उस क्षेत्र को अविमुक्त क्षेत्र समझ कर प्रवास करने के लिए कुटिया बनायें और तपस्या में लीन हो गये। कालान्तर में यही क्षेत्र महर्षि भृगु के नाम से भृगुक्षेत्र कहलाया। वर्तमान में इसी भूमि पर स्थित बागी बलिया (उत्तर प्रदेश, भारत) नामक नगर बस गया, जो स्वतंत्रता संग्राम में प्रथम आजाद जिला के नाम से जाना जाता है।


महर्षि भृगु के जीवन से जुड़े ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक सभी पक्षों पर प्रकाश डालने के पीछे मेरा सीधा मन्तव्य है कि पाठक अधूरी और अपूर्ण जानकारी के कारण पाखण्डी और आडम्बरवादी न बनें, बल्कि सत्य को स्वीकार कर के उदासी धर्म के मार्ग पर चलते हुए स्वविवेक का प्रयोग कर सके। हमारे धार्मिक ग्रन्थों में हमारे मनीषियों के वर्णन तो प्रचुर है, परन्तु उसी प्रचुरता से उसमें कल्पित घटनाओं को भी जोड़ा गया है। उनके जीवन को महिमामण्डित करने के लिए पौराणिक कथाओं के लेखकों ने उनकी ऐतिहासिकता से खिलवाड़ किया है, जिसके कारण भगवान भृगु जैसे लोगों के लिए भी शिव पुराण और हरिवंश पुराण में अपमान जनक शब्दों का प्रयोग किया गया है। इसके कारण भृगुवंशियों को भी कभी-कभी अपमानित होना पड़ जाता है। इसके कारण कभी-कभी तो ऐसी स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है जो संग्राम और महासंग्राम का भी कारण बन जाता है। वृत्रासुर के द्वारा कौशिकों के देश में आने वाले जल प्रवाह के मार्ग को अवरुद्ध करने के कारण जब उनके राज्य की नदियाँ सूखने लगी, पेड़-पौधे सूख गए, खेतीबाड़ी बन्द हो गई, उनके निवासी अपनी भूमि छोड़ कर अन्य देशों की ओर पलायन करने लगे तब यज्ञ के द्वारा वर्षा करवाने का निर्णय लेकर जब राजा विश्वामित्र भगवान तैयारियों में लग गए तब वृत्रासुर ने उनके द्वारा यज्ञ कार्य के लिए लाये हुए सभी गायों का हरण कर लिया था। इससे पञ्चगव्य आदि के अभाव में खण्डित हो रहे यज्ञ की सुरक्षा के लिए जब कौशिक विश्वामित्र जी ने वशिष्ठ ऋषि से सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाली कामधेनु गाय माँगने गये थे। लेकिन उनके पूर्वज़ भृगु के प्रति अपमान जनक बोल बोलते हुए किसी भी ब्राह्मण को उनके यज्ञ में सम्मिलित नहीं होने देने की धमकी देने से आक्रोशित होकर कौशिक विश्वामित्र भगवान ने वशिष्ठ ऋषि की गाय को जबरन ले जाने लगे थे। इसके कारण वशिष्ठ के सभी पुत्रों और शिष्यों ने अपने आश्रम में अतिथि के रूप में आये हुए भृगुवंशी राजा कौशिक विश्वामित्र भगवान पर आक्रमण करके दिया था। शिकार खेलने के दौरान अपने सैनिकों से भटक कर वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में अतिथि के रूप में आये हुए राजा कौशिक विश्वामित्र भगवान के साथ किये गये दुर्व्यवहार के कारण हुए उस संघर्ष का दोषी वशिष्ठ थे, इसके बावजूद उनके शिष्यों ने कथा लिखते समय सारा दोषारोपण राजा विश्वामित्र जी पर थोप दिया था। सिर्फ़ इतना ही नहीं वशिष्ठ ने छल पूर्वक कौशिक विश्वामित्र भगवान के सौ पुत्रों की हत्या भी कर दी थी। जिसका बदला लेने के लिए राज-पाट त्याग कर वे तपस्वी बन गये थे। और तपोबल से प्राप्त दिव्य शक्तियों के आगे वशिष्ठ को झुकने के लिए विवश कर दिये थे। 


महर्षि भृगु ने गङ्गा नदी के तट पर स्थित मुक्त क्षेत्र (वर्तमान बलिया जिला, उत्तर प्रदेश) में आने के बाद यहाँ के जंगलों को साफ कराया। यहाँ मात्र पशुओं के आखेट पर जीवन यापन कर रहे जनसामान्य को खेती करना सिखाया। यहाँ गुरूकुल की स्थापना करके लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाया। उस कालखण्ड में इस भू-भाग को नरभक्षी असुरों का निवास माना जाता था। उन्हें सभ्य और सुसंस्कृत बनानें का कार्य महर्षि भृगु और उनके बाद शुक्राचार्य जी के द्वारा किया गया था। कश्यप ऋषि की बड़ी पत्नी दिति देवी से जन्में दैत्यों, दनु देवी से जन्में दानवों, रक्षिका देवी से जन्में राक्षसों सहित अन्य असूरों के विकास के कार्य में मदद करने से नाराज़ कश्यप ऋषि की पत्नी अदिति देवी के पुत्रों के द्वारा विरोध करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं था। लेकिन दक्षिणा लोभी वशिष्ठों ने सदैव भोग-विलास में लिप्त रहने वाले आदित्यों के अधर्म को वीरोचित कर्म कह कर खुल कर प्रशंसा किया तो सदैव धर्म रक्षार्थ दान, दया और तप में लीन रहने वाले असूरों के प्रति अपमान जनक शब्दों का प्रयोग करते हुए दानवेन्द्र बलि जैसे धर्मात्मा को भी अधर्मी कह कर मान मर्दन का ही काम किया है। असूरों की बेटियों को बन्दी बना कर सदैव भोग-विलास में लिप्त रहने वाले इन्द्र, मित्र, वरुण और विष्णु की कथाओं से ही देवों का व्यक्तित्व पता चलता है। राक्षसेन्द्र रावण ने अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए भगवती सीता मइया का सिर्फ़ हरण किया था, लेकिन विष्णु ने तुलसी मइया के साथ जो किया था, क्या वह उचित? इन्द्र ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ जो किया था, क्या वह सही था? श्रीकृष्ण ने निर्दोष बाणासुर के सहस्त्र भाईयों का वध करके उनकी विधवा पत्नियों को द्वारका की नगर वधु बना कर क्या धर्म का काम किये थे?... बिल्कुल नहीं। इसके बावजूद उन अधर्मियों की सैकड़ों-हजारों वर्षों के बाद भी पूजा-पाठ और असली धर्माधिकारियों का विभिन्न पर्व-त्योहार के अवसर पर अपमान करने की प्रथा चला कर असुरों के वंशज़ों के हृदय पर कुठाराघात करना कैसे धर्म है? जिस तरह कश्यप भगवान की पत्नी अदिति देवी से जन्में आदित्य गण कच्छवाहा हैं, उसी तरह कश्यप ऋषि की ही अन्य पत्नियों से जन्में लोग भी कच्छवाहा ही हैं। लेकिन कच्छवाहा सम्मेलनों में सभी कच्छवाहों को आमंत्रित करने के बाद आदित्यों के वंशज़ों के द्वारा दिती और दनु आदि अन्य माताओं से जन्में कच्छवाहों के लिए बोले गये अपमान जनक शब्दों के कारण जब आज तक कच्छवाहा वंश के लोग ही एकजुट नहीं हो सके हैं तो अन्य लोगों के वंशज़ों को एकजुट करने की परिकल्पना कैसे साकार हो सकता है? विश्व बन्धुतव की विचारधारा पर चल कर ही इस स्वप्न को साकार किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए वशिष्ठ जैसे लोगों को सकारात्मक सोच को विकसित करने वाले साहित्य लिखने चाहिए। इतिहास लेखन का कार्य करने वाले लोगों को भी पक्षपात पूर्ण मनगढंत बातें लिखने के बजाए अच्छी हो या बूरी सभी पहलुओं पर विचार करते हुए सच्ची खबरें लिखनी चाहिए। ताकि भावी पीढ़ी के लोगों को ऐतिहासिक घटनाओं से प्रेरणा मिल सके। 


भृगु संहिता

======= संपादन जारी

महर्षि भृगु के परिवारिक जीवन से अपरिचित जन भी महर्षि द्वारा प्रणीत ज्योतिष-खगोल के महान ग्रंथ भृगु संहिता के बारे में जानते है। इस नाम से अनेक पुस्तके आज भी साहित्य विक्रेताओं के यहाॅ बिकती हुई दिखाई देती है।


महर्षि ने भृगु संहिता ग्रंथ की रचना अपनी दीर्घकालीन निवास की कर्म भूमि विमुक्त भूमि बलिया में ही किया था। इस सन्दर्भ दो बातें ध्यान देने की है। पहली बात यह है कि अपनी जन्मभूमि ब्रह्मलोक (सुषानगर) में निवास काल में उनका जीवन झंझावातों से भरा हुआ था। अपनी पत्नी दिव्या देवी की मृत्यु से व्यथित और त्रिदेवों की परीक्षा के उपरान्त जन्म भूमि से निष्कासित महर्षि को उसी समय शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर मिला जब वह विमुक्त भूमि में आये। भृगुकच्छ गुजरात में पहुॅचने के समय तक उनकी ख्याति चतुर्दिक फैल चुकी थी। क्योंकि उस समय तक उनके भृगु संहिता को भी प्रसिद्धि मिल चुकी थी और उनके शिष्य दर्दर द्वारा भृगुक्ष्ेत्र में गंगा-सरयू के संगम कराने की बात भी पूरा आर्यवर्त जान चुका था। आख्यानों के अनुसार खम्भात की खाड़ी में महर्षि के पहुॅचने पर उनका राजसी अभिनन्दन किया गया था, तथा वैदिक विद्वान ब्राह्मणों ने स्वस्तिवाचन करते हुए उन्हे आत्मज्ञानी ज्योतिष के प्रकाण्ड पण्डित के रूप में उनकी अभ्यर्थना की थी। जिससे यह बात प्रमाणित होती है कि महर्षि द्वारा भृगु संहिता की रचना सुषानगर से निष्कासन के बाद और गुजरात के भृगुकच्छ जाने से र्पूर्व की गई थी।


महर्षि की इस संहिता द्वारा किसी भी जातक के तीन जन्मों का फल निकाला जा सकता है। इस ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करने वाले सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति,शुक्र शनि आदि ग्रहों और नक्षत्रों पर आधारित वैदिक गणित के इस वैज्ञानिक ग्रंथ के माध्यम से जीवन और कृषि के लिए वर्षा आदि की भी भविष्यवाणियां की जाती थी।


महर्षि के कालखण्ड में कागज और छपाई की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। ऋचाओं को कंठस्थ कराया जाता था और इसकी व्यवहारिक जानकारी शलाकाओं के माध्यम से शिष्यों को दी जाती थी। कालान्तर में जब लिखने की विधा विकसित हुई और उसके संसाधन मसि भोजपत्र ताड़पत्र आदि का विकास हुआ, तब कुछ विद्वानों ने इन ऋचाओं को लिपिबद्ध करने का काम किया। 

🏺🌷🌺🌷🏺🌷🌺🌷🏺🌷🌺🌷🏺

Related Pages :

PRASENJEET SINGH http://fb.me/KaushikWarrior

Kaushik Consultancy Intelligence Bureau

http://fb.me/kcib.in


Related Group :

https://www.facebook.com/groups/434033520131584 


Related books :

परम सत्य का सार 

श्री विश्वकर्मा पुराण

भृगुसंहिता

शिव पुराण

हरिवंश पुराण 

मार्कण्डेय पुराण

भृगु आश्रम 


इस ब्लॉग को फॉलो करें और अन्य भृगुवंशियों या कौशिकों को इसके बारे में बताते हुए इसका लिंक भेजें। इस वंश की जागरूकता के लिए सहायक शोध कार्यों और पुस्तकों के प्रकाशन हेतु हमें संलग्न पता या बैंक एकाउण्ट में दान राशि भेज कर मदद करें। *


शोध, संकलन और सम्पादन :

सूचना सेवा तथा समाचार एजेंसी से सम्बन्धित गतिविधियों के लिए भारत सरकार से मान्‍यता प्राप्त पंजीकृत संगठन 

कौशिक कंसल्टेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो

बौद्ध विहार कॉलोनी, नया टोला कुम्हरार

पटना ८०००२६, बिहार, भारत 

पंजीकरण संख्या : BR26D0048912 


सञ्चालक, सम्पादक और निदेशक :

स्वामी सत्यानन्द दास प्रसेनजित सिंह महाराज

योगेश्वरी बन्दी मइया मन्दिर, जयवर 


प्रस्तावित योजना :

श्री दिव्या भृगु आश्रम, बड़गायां दौलतपुर 


1. Name in Bank Account :

PRASENJEET SINGH 

Account Number : 10276543380

IFSC Code : SBIN0015599

Bank's Name : State Bank of India

Branch : Dumari, Fatwah, Patna 

Parmanent Account No. GKOPS9686A 

Paytm A/C No. +91 9798905082 

Gpay A/C No. +91 9798905082  

https://www.linkedin.com/in/prasenjeet-singh-b40b95226  

 


2. Name in Bank Account :

SWAMI SATYANAND 

Account Number : 4581101000140

IFSC Code : CNRB0004581

Bank's Name : Canara Bank

 Branch : Rukunpur, Fatuha, Patna



गुरुवार, 23 जून 2022

कटास राज मन्दिर

कटास राज मन्दिर और अमृत कुण्ड कटासराज 

महाभारत की कथा में वर्णित इसी सरोवर के
किनारे युद्धिष्ठिर ने यक्ष के सभी सवालों का जवाब
देकर अपने भाईयों को पुनर्जीवन दिया था
 

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित आदि ग्रन्थ महाभारत के वन पर्व में स्थित एक श्लोक के अनुसार "भूनेत्र अर्थात भूमि की आँख" के नाम से प्रसिद्ध महातीर्थ कटाक्ष वह स्थान है, जो सभी पापों को धो देता है। इस महातीर्थ को धारण करने वाले राज्य को लोग कठ गणराज्य के नाम से भी जानते थे। हालांकि कठ गणराज्य का अस्तित्व तो नहीं रहा, मगर पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित चकबल में कल्लर कहार मार्ग पर कटास नामक वह प्राचीन गाँव आज भी है, जहां स्थित अमृत सरोवर का जल वही व्यक्ति पी सकता था जो उस सरोवर की रक्षा करने वाले यक्ष के सभी सवालों का सही-सही जवाब देता। युद्धिष्ठिर ने इसी सरोवर के किनारे यक्ष के सभी सवालों का जवाब देकर अपने अचेत भाईयों की जान बचाई थी। इस गाँव में प्रवेश करते ही "कटास राज चौक, श्री कटास राज मन्दिर और श्री अमृत कुण्ड" का बोर्ड दूर से ही दिखाई देता है। 

 

कुछ जगहों पर पाकिस्तान सरकार के द्वारा लगवाये गये साइनबोर्ड को आप भी देख सकते हैं कि उसमें लिखवाये गये सन्देश पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दू के बजाए भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी में लिखा गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय पर्यटक, विशेष रूप से राजस्थान के पर्यटक उन सन्देशों को आसानी से समझ सकें। 

उस पवित्र तीर्थ धाम के पास वक्फ़ बोर्ड के द्वारा लगवाये गये अन्य साइनबोर्ड में हिन्दी, इंग्लिश और उर्दू भाषा में भी लिखवाये गये सन्देशों से श्री कटास राज तीर्थ स्थान के बारे में पर्यटकों को जो जानकारी मिलती है उसके अनुसार इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने श्री कटासराज तीर्थ को भगवान शिव का तीर्थ माना है। 

कटासराज मन्दिर में स्थित प्रतिमायें

कहते हैं कि माँ पार्वती! अपने पिता प्रजापति दक्ष के द्वारा अपने पति का अपमान नहीं सह पाने के कारण यज्ञ कुण्ड में कूद कर जब सती हो गयी, तब भगवान शिव के आँखों में छलक आये अश्रुबुन्द जिन दो जगहों पर गिरे थे, वहाँ पर पवित्र अमृत कुण्ड बन गये थे। भगवान शिव की आँखों में छलक आये आँसू के एक बुन्द राजस्थान के अजमेर नामक जिस भारतीय क्षेत्र में गिरा था वहाँ पर निर्मित पुष्कर सरोवर! तीर्थ स्थान पुष्कर राज के नाम से प्रसिद्ध हुआ तो भगवान शिव जी की आँखों से दूसरा अश्रुबुन्द जिस स्थान पर गिरा था, उस स्थान पर बना हुआ सरोवर "तीर्थ कुण्ड श्री कटास राज" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

1947 ईस्वी में हुए भारत के बंटवारे के बाद आज दोनों तीर्थ कुण्ड दो अलग-अलग देशों में स्थित है।

शास्त्रों में कटास-राज और पुष्कर-राज नामक तीर्थ स्थानों को धरती का नेत्र कहा गया है। यजुर्वेद में श्री कटासराज धाम को सारस्वत प्रदेश में स्थित ब्रह्मावर्त कहा गया है। इस तीर्थ की महानता का प्रमाण आदि ग्रन्थ महाभारत में वर्णित उस घटना से मिलता है, जिसके बारे में लोगों की यह मान्यता है कि कटास-राज अमृत कुण्ड जो पहले एक आम सरोवर की तरह दिखाई देता था, उसी सरोवर के किनारे पाण्डवों के बड़े भाई युधिष्ठिर और उस सरोवर की रक्षा करने वाले यक्ष के बीच वह बहुचर्चित संवाद हुआ था, जिसके कारण यक्ष के द्वारा पूछे गए सभी सवालों के जवाब देकर युद्धिष्ठिर ने न केवल धर्मराज की पदवी पाया था, बल्कि इसी कटास राज सरोवर के पवित्र जल का छिड़काव कर के अचेत अवस्था में पड़े हुए अपने चारों भाईयों को पुनर्संजीवित किया था। पाण्डवों के साथ घटित उस अविष्मरणीय घटना के कारण कटास-राज सरोवर एक महान तीर्थ स्थल के रूप में संसार में अपनी सुगन्ध फैलाने लगा।

पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के जिला चकबल में कटास नामक एक गाँव आज भी है। कहते हैं कि इस गाँव में स्थित हिन्दुओं का महान तीर्थ "कटास राज अमृत कुण्ड" 1947 ईस्वी में भारत का बंटवारा होने से पहले हिन्दु धर्म का मुख्य केन्द्र था। यहाँ पर हिन्दी और संस्कृत का महाविद्यालय भी स्थित था, जिसे बंटवारे के बाद बन्द करके स्थायी रूप से खत्म कर दिया गया। लेकिन उस तीर्थ स्थल पर कटास राज का प्राचीन मन्दिर, सरोवर और महाविद्यालय के अवशेष अभी भी बचे हुए हैं। जिसकी देख-रेख पाकिस्तान वक्फ़ बोर्ड कर रही है। हालांकि अब श्री कटास राज कुण्ड की पानी का इस्तेमाल नहीं होने के कारण कुण्ड में सर्वत्र काई जम गया। इसके कारण भगवान शिव के प्रति आस्थावान लोगों के उस तीर्थ स्थान का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। जिसे समय रहते नहीं बचाया गया तो इंसानियत की शुरुआत जिस एक परिवार से हुआ था उसका आखिरी अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा। फिर जाति, धर्म और समुदाय के नाम पर लड़ने वाले लोगों को कैसे यकीन दिलाया जाएगा कि सभी धरती वासी एक ही परिवार के सदस्य हैं?

देखें कहाँ है कटास राज मन्दिर👇
🏚️ Katas Raj Temples
PXF2+HMR, Kalar Kahar Rd, Katas, Chakwal, Punjab, Pakistan
https://maps.app.goo.gl/4T9j3hH2S5xtmeEs6

शनिवार, 16 अप्रैल 2022

Introduction of the Kaushik Gotra's Kumbhi community of Bargayan people

कौशिक गोत्र का परिचय

लेखक, स्वामी सत्यानन्द उर्फ़ प्रसेनजित सिंह कौशिक

ब्रह्मर्षि कौशिक विश्वामित्र भगवान के बारे में एक तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, दूसरा इनके बारे में कुछ जानकारी उपलब्ध है भी तो झूठी और गलत जानकारी ही ज्यादा है। इसका मूल कारण है इनसे सम्बन्धित आलेख लिखने वाले लोगों का हमारे कौशिक गोत्रीय समाज से सम्बन्धित नहीं होना। मैंने गूगल सर्च के दौरान ऐसे कई आलेख देखें हैं जिसमें से कुछ आलेखों में कौशिक विश्वामित्र भगवान को कुशनाभ का पौत्र बताया गया है, तो कई आलेखों में कुशाम्ब का पौत्र बताया गया है। जबकि सच्चाई यह है कि कौशिक विश्वामित्र भगवान! कुशिक के पौत्र थे। कुशिक के पुत्र होने के कारण ही कौशिक विश्वामित्र भगवान के पिता महेन्द्र गाधी! कौशिक के नाम से विख्यात हुए। कौशिक गाधी की ज्येष्ठ पुत्री सत्यवती काली जो भृगुवंशी ब्राह्मण ऋचिक ऋषि की पत्नी और जमदग्नि ऋषि की माता थी, वे भी कुशिक वंशी होने के कारण कौशिकी कहलायी।


कौशिकी काली! कौशिक विश्वामित्र जी की ज्येष्ठ बहन और कौशिक गाधी की ज्येष्ठ पुत्री थी। जिस स्थान पर इनका निवास स्थल था वहाँ पर प्रवाहित होने वाली नदी इसी देवी के नाम पर आज भी काली नदी के नाम पर विख्यात है जबकि यही नदी आगे बढ़ने पर कोसी नदी (कौशिकी नदी का अपभ्रंश) के नाम से पहचाना जाता है।

बलकाश्व नन्दन कुश के चार पुत्रों कुशिक, कुशनाभ, कुशाम्ब और मूर्तिमान में से कुशिक ज्येष्ठ थे तथा वनवासी पह्लवों के साथ पल कर बड़े हुए थे। राजा कुशिक की पत्नी पुरुकुत्सकी सूर्यवंशी राजा पुरुकुत्स की पुत्री थी।

कौशिक विश्वामित्र भगवान की पत्नी शालावती के गर्भ से उत्पन्न तीन पुत्रों देवश्रवा, कात्यायन गोत्र के प्रवर्तक कति और एक अन्य पुत्र हिरण्याक्ष का जन्म हुआ था। विदित हो की हिरण्याक्ष नामक एक राजा हिरण्यकशिपु के भी छोटे भाई हुए थे, लेकिन ये हिरण्याक्ष कौशिक विश्वामित्र भगवान के पुत्र थे। कौशिक विश्वामित्र भगवान की दूसरी पत्नी रेणु से उत्पन्न पुत्रों के नाम रेणुमान, सांकृति, गालव, मुद्गल, मधुछन्द, जय और देवल था। दृषद्वती के गर्भ से अष्टक का जन्म हुआ जबकि ययाति नन्दन यदु की बहन माधवी के गर्भ से कच्छप और हारित का जन्म हुआ था। नर्मदा नदी के तट पर स्थित नर्मपुर वासीनी देवी चक्षुष्मति के गर्भ से भगवान अग्निदेव को भी कौशिक विश्वामित्र भगवान ने जन्म दिया था। इनके अलावा पाणिन, बभ्रु, ध्यानजप्य, पार्थिव, शुनःशेप देवरात, शालङ्कायन, बाष्कल, लोहित, यामदूत, कारीषु, सौश्रुत, कौशिक, सैन्धवायन, देवल, रेणु, याज्ञवल्क्य, अघमर्षण, औदुम्बर, अभिष्णात, तारकायन, चुञ्चुल, शालावत्य और सांकृत सहित कौशिक विश्वामित्र भगवान को १०८ विद्वान पुत्र हुए थे। यह बात और है कि कौशिक विश्वामित्र भगवान के आठ पुत्रों के जन्म लेने से पहले हुए एक विवाद के दौरान महर्षि वशिष्ठ ने कौशिक विश्वामित्र भगवान के एक पुत्र को जीवित छोड़ कर सभी ९९ पुत्रों का अपने आश्रम में ही छल पूर्वक हत्या कर दिया था। एक ब्राह्मण के द्वारा हुए शर्मनाक हार और पुत्रशोक के कारण राजपाट त्याग कर तपोभूमि में जाने के बाद कौशिक विश्वामित्र भगवान ने कच्छप, हारित, शुनःशेफ, गालव और अग्नि आदि आठ पुत्रों को भी जन्म दिया था। 


इसके अलावा एक अप्सरा मेनका के गर्भ से भी कौशिक विश्वामित्र भगवान के अंश से देवी शकुन्तला ने जन्म लिया था, जो राजर्षि कण्व की दत्तक पुत्री बन कर पुरुवंशी राजा दुष्यंत कुमार की पत्नी और भरत की माता बनी थी। वन देवी शकुन्तला के अलावा कौशिक विश्वामित्र भगवान की एक और अति सुन्दरी कन्या थी। जो जन्म से ही कुब्जा होने के कारण कान्यकुब्ज के नाम से प्रसिद्ध थी। देवी कान्यकुब्ज के पुत्रों द्वारा शासित राज्य ही कन्नौज के के नाम से विख्यात हुआ था। वैदिक कथाओं में स्पष्ट उल्लेख है कि कौशिक विश्वामित्र भगवान के कुशिक नामक पूर्वज़ वनवासी पह्लवों के साथ बड़े हुए थे। मतलब यह कि पह्लव कहलाने वाले लोग राजा कुशिक के समय मौजूद थे। जबकि वशिष्ठ और विश्वामित्र भगवान के बीच वशिष्ठ आश्रम में ही होने वाले विवाद के दौरान कुछ पुस्तकों में ऐसा उल्लेख है कि वशिष्ठ ऋषि की प्रार्थना करने पर कामधेनु गाय ने अपने स्वांस से पह्लव नामक युद्धप्रिय सैनिकों को उत्पन्न किया था। पौराणिक कथाओं में इस तरह की अलंकारिक भाषा का उल्लेख ही इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इन कथाओं को लिखने वाले लोगों की मंशा कौशिक गोत्रीय लोगों को अपमानित करना है। यही कारण है कि आज भी वशिष्ठ समर्थक ब्राह्मणों के द्वारा कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों को यज्ञ अनुष्ठान करवाने और दान लेने के अधिकार का विरोध करते हैं। जबकि भगवान शिव ने कौशिक विश्वामित्र भगवान को ब्रह्मर्षि कहलाने का वरदान दिया था तब शिव पुत्र कार्तिकेय भगवान ने कौशिक विश्वामित्र भगवान से दीक्षा लेकर उन्हें ब्राह्मण के रूप में मान्यता दिये भी दिये थे। सिर्फ़ इतना ही नहीं बल्कि सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित करके सामुहिक रूप से यह निर्णय लिया गया था कि आज से जितने भी देवी-देवता हैं उन्हें मिलने वाले यज्ञ भाग विश्वामित्र नन्दन भगवान अग्निदेव के द्वारा ही प्राप्त करने होंगे। इसके लिए सबसे पहले अग्निदेव की स्वाहा नामक ज्येष्ठ पत्नी के द्वारा यज्ञ सामग्री भगवान अग्निदेव को समर्पित किया जाएगा तथा अग्निदेव के द्वारा ही अन्य देवी-देवताओं और पितरों को दिया जाएगा। इसके लिए विश्वामित्र भगवान के पुत्र ब्रह्मऋषि हारित ने यज्ञोपवित और यज्ञ अनुष्ठान के जो नियम बनाया, उसे ही तीनों लोकों में सर्वसम्मति से लागू किया गया था। आज भी उन्हीं रीति-रिवाजों से यज्ञ अनुष्ठान किये जाते हैं। लेकिन आज तक कौशिक विश्वामित्र भगवान के प्रति द्वेष भाव रखने वाले पाखण्डियों की जमात कौशिक गोत्रीय लोगों को ब्राह्मण मानने से इंकार करते हैं। लेकिन जो लोग कौशिक गोत्रीय हैं उन्हें अपने सोये हुए स्वाभिमान को जगाने की जरूरत है।

Follow us on Facebook Group of Kaushik Gotra's Indigenous clan :

https://www.facebook.com/groups/434033520131584 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

कौशिक गोत्रीय लड़कियों का एक गाँव जहां की लड़कियों को आसानी से नहीं मिलते हैं दुल्हे


कुषान कालीन लौरिया नन्दन गढ़ का टीला


बिहार के लौरिया प्रखण्ड में स्थित है 6 फीट लम्बी लड़कियों का एक गाँव, जहां की लड़कियों को उनकी अधिक लम्बाई के कारण आसानी से नहीं मिलते दूल्हे। 


अमिताभ बच्चन की सुपर हिट फिल्म लावारिस का गाना- "जिसकी बीबी लम्बी उसका भी बड़ा नाम है" .. तो आपने सुना ही होगा। लेकिन यह गाना सुनने में भले ही अच्छा लगता है, लेकिन जिसके घर की लड़कियां लम्बी होती हैं उन्हें ही इसके कारण होने वाली तकलीफ़ों का अहसास होता है। बिहार के एक गांव में लड़कियों की लम्बाई उनकी शादी में बड़ा रोड़ा बन गया है। गांव की लड़कियों की औसत लम्बाई 5 फीट 10 इंच है। इसके कारण उन्हें आसानी से दूल्हा नहीं मिल पाता है। जबकि, मेडिकल रिसर्च एजेंसी भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद के तहत आने वाले शोध संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (NIN) के मुताबिक देश की महिलाओं की औसत ऊंचाई 5 फीट 3 इंच है।


छह फीट से भी ज्यादा लम्बे होते हैं मरहिया लोग :

यह गांव है पश्चिमी चम्पारण में बूढ़ी गण्डक के किनारे लौरिया प्रखण्ड के ऐतिहासिक स्थल नन्दन गढ़ के पास स्थित मरहिया। हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध यह शान्तिप्रिय गांव लम्बे पुरुषों और महिलाओं के लिए चर्चित है। यहाँ 90% पुरुषों की लम्बाई 6 फीट 3 इंच से ज्यादा तो महिलाओं की लम्बाई 5 फीट 10 इंच से भी ज्यादा है। यहाँ के अधिकांश पुरुष 6 फीट 3 इंच से लेकर 6 फीट 9 इंच तक की लम्बाई वाले हैं। इतनी लम्बाई के कारण पुरुषों को तो कोई परेशानी नहीं होती है लेकिन लड़कियों के लिए समस्या हो रही है। उनकी शादी करने के लिए उनके लायक वर की तलाश करने में दिक्कतें हो रही हैं। यहाँ ज्यादातर लड़कियों की लम्बाई सामान्य से ज्यादा है।


मरहिया में करीब 1400 लोगों की है आबादी :

लम्बाई ज्यादा होने से बाहर के गांवों में इनसे ज्यादा हाइट वाले पुरुष नहीं मिलते हैं। परिजनों को अपनी बेटियों के लिए दूल्हा खोजने में काफी परेशानी होती है। मरहिया गांव लौरिया स्थित नन्दनगढ़ से मात्र 6-7 सौ मीटर की दूरी पर ही बसा हुआ है। यहाँ 250 घर हैं, जिसकी आबादी लगभग 1400 है। यहाँ 600 लड़कों की लम्बाई छह फीट से ज्यादा है। ग्रामीणों के मुताबिक लम्बाई ज्यादा होने का फायदा यहाँ के पुरुषों को फौज़ की बहाली में मिल जाता है। जिसके कारण यहाँ के ज्यादातर बच्चे सेना की तैयारी करते हैं। अपनी इस विशेषता के कारण यहाँ के युवा बड़ी संख्या में सेना में कार्यरत भी हैं। आर्मी में भी इस गांव के लोगों की अलग पहचान है।


आर्मी में जाने के लिए जमकर प्रैक्टिस :

मरहिया गांव में सुबह पहुंचेंगे तो यहाँ के युवक दौड़ते हुए नजर आएंगे। आर्मी में जाने के लिए प्रैक्टिस करते दिखेंगे। स्थानीय युवक सुशील कुमार ने बताया कि सुबह 4 बजे से उठ जाते हैं। इसके बाद युवाओं की टोली फील्ड में पहुंच जाती है। सड़कों के किनारे भी दौड़ लगाते हैं।


लम्बाई के कारण फौज़ में मिलती है प्राथमिकता :

लम्बी हाइट होने के कारण इन लोगों को प्राथमिकता भी मिलती है। वहीं प्रशान्त सिंह ने सेना में शामिल हुए कई ग्रामीणों का नाम बताया। उन्होंने कहा कि रिंकू सिंह, गोपाल सिंह, विपिन सिंह, रुपेश सिंह, धनंजय सिंह, झुनझुन सिंह, भगवन्त सिंह, मुन्ना सिंह जैसे कई लोग आर्मी में गांव और राज्य का नाम रोशन कर रहे हैं।

मरहिया के कौशिक गोत्रीय स्थानीय ग्रामीण


सीवान से आए थे मरहिया लोग :

मरहिया गांव के 250 घरों में कुल 1400 से अधिक की आबादी रहती है। यहाँ 100 घर कौशिक गोत्रीय राजपूत जाति की है। जिसमें 650 से अधिक राजपूत परिवार के लोग रहते हैं। ये लोग सीवान जिले के पीपड़ा नामक गांव के पास स्थित हलुआर नामक गांव से आये थे। लेकिन अब यह गाँव गोपालगंज में पड़ता है। इनके पूर्वज़ जिस जगह पर मरहिया नामक गांव को बसाये थे, वह बेतिया रियासत के लौरिया नन्दन गढ़ के इलाके में पड़ता था। गूगल मैप के संलग्न लिंक पर देख सकते हैं मरहिया गांव की स्थिति :

https://maps.app.goo.gl/EMmed4BsLQo5agqP8


पूर्वजों ने बचाई थी राजा की जान :

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पाँच पीढ़ी पहले बेतिया राज के अंतिम महाराज हरेन्द्र किशोर सिंह की पालकी यहाँ (लौरिया नन्दन गढ़) से गुजर रही थी। अचानक एक मतवाले हाथी ने उन लोगों पर हमला कर दिया। राजा की सुरक्षा में तैनात लोग जी-तोड़ कोशिश करने पर भी जब उस हाथी को काबू नहीं कर पा रहे थे। तभी वहां से गुजर रहे हलुआर नामक गाँव के कौशिक वंशीय लोगों के पूर्वज़ ध्रुवनारायण सिंह जो पशुपतिनाथ जी का दर्शन कर के अपने साथियों के साथ लौट रहे थे, उन्होंने खतरा भांपते ही अपने तलवार के एक ही वार से हाथी का सूंड काट दिया था। जिसके कारण मतवाले हाथी की मौत तो हुई ही राजा हरेन्द्र किशोर सहित उनके साथ चल रहे परिजनों की भी जान बच गई थी। ध्रुव नारायण सिंह के अदम्य साहस से खुश होकर बेतिया के राजा हरेन्द्र किशोर ने ध्रुव नारायण सिंह को अपनी अंगुठी भेंट करते हुए दरबार में खास अतिथि के रूप आमंत्रित किया था।


बेतिया के राजा ने दिया था इनाम :

अपने जान पर खेल कर बेतिया के राज परिवार की जान बचाने के कारण हलुआर के राजपूत ध्रुवनारायण सिंह की बहादुरी की हर ओर चर्चा होने लगी थी। उस घटना के बाद जब ध्रुव नारायण सिंह बेतिया राज के दरबार में हाजिर हुए, तब उनका भव्य स्वागत करते हुए राजा हरेन्द्र किशोर सिंह ने उनकी बहादूरी के लिए मरहिया में 100 बीघा जमीन इनाम के रूप में देते हुए उन्हें लौरिया नन्दन गढ़ के पास ही बसने के लिए आग्रह किया था। इसके कारण ध्रुवनारायण सिंह सीवान के हलुआर नामक गांव से आकर मरहिया में बस गए थे। तब से मरहिया के उस जमीन पर ध्रुव नारायण सिंह के परिवार के वंशज़ों से अब 100 घर हो गए हैं। उस गांव के राजपूतों को लम्बाई पूर्वजों से विरासत में मिला है।


लौरिया नन्दन गढ़ का है कौशिक गोत्रीय लोगों से पुराना सम्बन्ध :

लौरिया नन्दन गढ़ जो मौर्य वंश के शासक सम्राट अशोक के शिलालेखों और विजय स्तम्भ के लिए पहचाना जाता है, इसका सम्बन्ध प्राचीन काल से ही कौशिक गोत्रीय लोगों से रहा है। हालांकि इससे सम्बन्धित ऐतिहासिक लेखों में लौरिया नन्दन गढ़ का सम्बन्ध कुषान शासकों से बताया गया है। लेकिन बहुत कम लोगों को ही पता है कि कुषान वंशीय लोग बलकाश्व नन्दन कुश के वंश में उत्पन्न कौशिक विश्वामित्र भगवान के ही वंशज़ हैं। लौरिया नन्दन गढ़ को लोग मौर्य शासकों से भी पहले के कौशिक गोत्रीय राजाओं के राजमहल का स्थान मानते थे, लेकिन ब्रिटिश इतिहासकारों ने इस जगह पर किये गये खुदाई से प्राप्त अवशेषों के आधार पर लौरिया नन्दन गढ़ में स्थित टीलानुमा आकृति को समाधि स्थल बताया है। इस सम्बन्ध में सच्चाई क्या है किसी को नहीं पता है। इसके बावजूद यहाँ पर कौशिक गोत्रीय समाज से सम्बन्धित विभिन्न धर्मों के लोग यदा-कदा पर्यटक के रूप में आते रहते हैं। 








हलुआर में आज भी रहते हैं मरहिया के राजपूतों के पूर्वज़ :

कौशिक गोत्रीय सरदार ध्रुव नारायण सिंह के पूर्वज़ों के वंशज़ आज भी हलुआर नामक गाँव में रहते हैं। यह गाँव गोपालगंज जिला मुख्यालय से पूरब मगर सीवान से पूर्वोत्तर दिशा में गोपालगंज-सोनवर्षा मार्ग पर स्थित पिपड़ा नामक गाँव के पास हैं। उस गाँव में स्थित हाई स्कूल हलुआर पिपड़ा +2 वहां के कौशिक गोत्रीय राजपूतों के जमीन पर ही निर्मित है। 

हाई स्कूल हलुआर पिपड़ा +2, गोपालगंज, बिहार

शिव मन्दिर, हलुआर, गोपालगंज, बिहार

बुधवार, 26 जनवरी 2022

KUMBHI BAIS OF THE KOMI REPUBLIC IN RUSSIA

 

कुम्भी बैस बनाम स्लाविक रोडनोवर्स

स्लाविक रोडनोवर्स! इजिप्ट और रोमन साम्राज्य से विस्थापित हुए कुम्भी मूल के वे लोग हैं जो न केवल आज भी अपने पुरखों की परम्परागत संस्कृति को बचाये हुए हैं बल्कि आधुनिकता के नाम पर अपनी मूल संस्कृति को छोड़ते जा रहे कौशिक गोत्रीय कुम्भी समाज के लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़े रखने के लिए हर सम्भव प्रयास करने के लिए प्रयत्नशील हैं। इस समुदाय के कारण ही रूस के कोमी राज्य में रहने वाले कुम्भी जाति के लोग अपने घरों व मन्दिरों में प्रवेश करने के लिए सबसे पहले अपने बायें पैर को आगे बढ़ाते हैं। इसी तरह अपने विजय की आकांक्षा या शुभ परिणाम की कामना करते हुए सभी तरह के अभियान पर प्रस्थान करने के लिए सबसे पहले अपने बायें कदम को आगे बढ़ाना ही शुभ समझते हैं। भारतीय कुम्भी समुदाय की तरह रूस के कोमी नामक राज्य में रहने वाले कोमी समुदाय के लोग भी ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करने के लिए मुण्डन करवाते हैं, मगर माथे पर धारण करने वाले केशशिखा को यूक्रेन, स्कॉटलैण्ड और आयरलैण्ड में रहने वाले कौशिक गोत्रीय कुम्भी समाज की तरह ही बायीं ओर झुकाये रखते हैं या बायीं ओर लपेटते हुए अपनी केशशिखा बाँध कर अपने पुरखों की तरह वाममार्गी संस्कृति का अनुयायी होने का स्मृत चिह्न धारण करते हैं। अपने पुरखों की तरह बायें कानों में कुण्डल पहनते और इसाई बहुल रसीयन समाज से घिरे होने के बावजूद अपने पारम्परिक मूर्ति पूजा और रीति-रिवाजों का आज तक पालन करते हैं।


इनकी मूल भाषा भले ही बदल गयी है लेकिन वंशानुगत संस्कारों के प्रति अपने श्रद्धा, विश्वास और आस्था को बचाये हुए हैं। खुद को अपने कुल देवता कपोत (कबूतर) का वंशज़ समझ कर न तो कपोत का माँस खाते हैं न ही इसका शिकार करते हैं। विदित हो की शिव के अंश से कार्तिकेय भगवान के जन्म को सफल बनाने के लिए कौशिक विश्वामित्र भगवान और उनकी पत्नी चक्षुस्मति देवी के गर्भ से उत्पन्न पुत्र अग्निदेव ने कपोत का रूप धारण कर के जो लीला किया था उसकी कथा शिव पुराण में उल्लिखित है। इस ग्रन्थ में वर्णित अग्निदेव की कथा के अनुसार नर्मदा नदी के किनारे स्थित नर्मपुर की नाग कन्या के गर्भ से कौशिक विश्वामित्र भगवान ने गृहपति नामक जिस पुत्र को जन्म दिये थे वही बाद में अग्निदेव के नाम से प्रसिद्ध हुए। पुत्र प्राप्ति के लिए जिस समय भगवती पार्वती! भगवान शिव के साथ विहार कर रही थी उसी समय उनके गुफा द्वार पर अचानक पहुंचे देवताओं ने बहुत इन्तज़ार करने पर भी जब यह पाया कि शिव जी अपनी गुफा से बाहर नहीं आ रहे हैं तब कौशिक नन्दन अग्निदेव से कहा था कि आप कपोत का रूप धारण कर के उनकी गुफा में जायें और अन्दर की घटना देख कर हमें बतायें कि शिव जी क्या कर रहे हैं? वे हमारे आवाज़ देने पर भी बाहर क्यों नहीं आ रहे? देवताओं के आग्रह करने पर कपोत रूप में अग्निदेव को अपनी गुफा में आने की आहट महसुस करते ही पार्वतीजी के साथ आलिंगनबद्ध शिव जी अपनी शैय्या से अचानक उतर गये थे, जिसके कारण उनका वीर्य उनकी शैय्या के बगल में भूमि पर ही गिर गया था। इसके कारण देवताओं के आग्रह पर कपोत का रूप धारण कर के भगवान अग्निदेव ने शिव जी के वीर्य को सावधानी पूर्वक उठा कर भगवती गङ्गा के गर्भ में स्थापित कर दिया था। उनके प्रयासों के कारण ही देवी गङ्गा ने अपने गर्भ से शिवपुत्र कार्तिकेय जी को उस जगह पर जन्म दिया था जहां अग्निदेव की पत्नियों स्वाहा, स्वधा और विशाखा से उत्पन्न पुत्रों शरवा, विशरवा और नैगमेय का भी जन्म और पालन-पोषण हुआ था। इसके कारण ही रसीया में स्थित कोमी गणराज्य में रहने वाले कौशिक गोत्रीय अग्निदेव के वंशज़ खुद को कपोत वंशी बताते हुए अपना जातिय चिह्न सुनहला कबूतर बताते हैं। 

रूस के कोमी गणराज्य का राज्यचिह्न : सुनहरा कपोत


इनकी कुल देवी बन्दी मइया और सत्यवती काली के नाम से विख्यात वह देवी हैं, जिनके प्रयासों के कारण उनकी माता ने कौशिक गाधि बाबा के वंश को बढ़ाने के लिए कौशिक विश्वामित्र भगवान को जन्म दिया था। अफ्रीका की स्वाहिली भाषा में पिता की बहन को बन्दी कहा जाता है। इसे ही भारतीय हिन्दीभाषी समुदाय के द्वारा फुआ और बुआ तो मुस्लिम समुदाय के द्वारा खाला भी कहा जाता है। इसके कारण ही कुम्भ देश के नाम से विख्यात अफ़्रीकी भूभाग से विस्थापित कौशिक गोत्रीय अग्निवंशियों की कुल देवी सत्यवती काली मइया को कौशिक गोत्रीय लोग बन्दी मइया के नाम से भी पूजते हैं। चाहे ये लोग विश्व के किसी भी भाग में रहें अपनी कुल देवी बन्दी मइया अर्थात् भगवती काली मइया के प्रति अपनी आस्था को आज तक बनाये हुए हैं। शिवांश कार्तिकेय जी के प्रतिपालक के रूप में विख्यात भगवान अग्निदेव के स्वरूप कबूतर के प्रति आस्था भी सराहणीय है। 


शिव भक्ति के कारण ब्रह्मर्षि कहलाने वाले कौशिक विश्वामित्र भगवान को शिव पुराण में रूद्रावतार भी कहा गया है। इसके कारण कौशिक गोत्रीय कुम्भी समाज के द्वारा बसाये गये रसीयन गणराज्य कोमी में कुम्भी बैस कहलाने वाले बड़गायां समाज के लोग रोडनोवर्स भी कहलाते हैं। इनकी आबादी रसीयन आबादी का मात्र १% ही बचा है। जबकि कोमी मूल के ही अन्य लोगों की आबादी रसीयन आबादी का ३०% है। ये लोग रोजी-रोटी के चक्कर में आधुनिक और शहरी कहलाने के लिए रसीयन शहरों में रहने वाले इसाईयों के साथ रहते-रहते इसाई धर्म को ही अपनाते जा रहे हैं। हालांकि रसीयन देशों के लोग भी ११वीं शताब्दी तक वैदिक सनातन धर्म को ही मानते थे। लेकिन उन लोगों के एक सनकी राजा के जिद के कारण उनके राज्य के नागरिकों को भी इसाई बनने के लिए मजबूर होना पड़ा था। हालांकि अब इसाई धर्म की शुरुआत करने वाले लोगों की मनमानी देख कर रसीयन देशों के लोग सनातन धर्म की ओर लौटने लगे हैं। लेकिन अपने वंश और गोत्र से सम्बन्धित अपनी मूल संस्कृति को भुला चुके हैं। इसके कारण अपने संस्कृति के बारे में जानने के लिए भारतीय सन्तों से सम्पर्क स्थापित करने के लिए भारत के तीर्थ स्थलों में भटकते हुए उन्हें देखा जा सकता है। ऐसे लोगों को उनका असली इतिहास बताने का प्रयास  कौशिक कंसल्टेंसी इंटेलीजेंस ब्यूरो नामक मेरा संगठन कर रहा है। जैसे ही मुझे इस बात की जानकारी हुई कि रूस में भी हमारे कुम्भी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं, उनके बारे में जानकारी जुटाने लगा था। विदित हो की सबसे प्राचीन जन-जाति वाले कोमी समुदाय की आबादी का विकास दर रूस में रह रहे अन्य लोगों की अपेक्षा कोमी राज्य में भी लगातार घटती जा रही है। यही हाल हमारे देश भारत सहित तमाम एशियाई, अफ्रिकी, अमेरिकी, यूरोपीय और ऑस्ट्रेलियाई देशों में भी रहने वाले कुम्भी समुदाय की भी है। जो इस समाज के अस्तित्व के लिए चिन्ताजनक है। 


बुधवार, 22 दिसंबर 2021

भारत के नामकरण का मेरू पर्वत से है पौराणिक सम्बन्ध


भारतवर्ष के नामकरण का पौराणिक सच :

इथियोपियाई माउण्टेन मेरू का नामकरण मेरू नामक जिस देवी के नाम पर हुआ था उनके पुत्र के नाम पर ही नामकरण हुआ था भारतवर्ष का।



Mount Meru in Tanzania

Mount Meru in Tanzania


आदि मनु के नाम से विख्यात स्वयंभू मनु के पौत्र प्रियवर्त के पुत्र ने भारतवर्ष को बसाया था। वायुपुराण के अनुसार स्वयंभू मनु के पुत्र प्रियवर्त जो जम्बूदीप के राजा थे, उन्हें जब कोई पुत्र नहीं हुआ तब अग्निन्ध्र नामक अपने दौहित्र (पुत्री के पुत्र) को अपना दत्तक पुत्र बना कर पालन-पोषण किये थे। प्रजावत्सल अग्निन्ध्र के पुत्र नाभि का विवाह मेरू नामक जिस देवी के साथ हुआ वे भी जम्बूदीप नामक उसी लोक की रहने वाली थी जहां की प्राचीन सभ्यता के लोगों को आज भी पुरातत्वविद God of Kush कह कर पुकारते हैं। हालांकि जम्बूदीप का एक छोटा सा भाग ही कुश नामक राजा के नाम पर कुश देश के नाम से प्रसिद्ध हुआ था। लेकिन इस देश के अस्तित्व में आने से हजारों साल पहले नाभि की पत्नी मेरू के गर्भ से जिस ओजस्वी पुत्र का जन्म हुआ था उनका नाम ऋषभ था। इसी ऋषभदेव के पुत्र का नाम भरत था तथा इसी भरत के द्वारा हिमालय पर्वत के दक्षिणी भाग में आबाद देश का नाम भारतवर्ष पड़ा था। लेकिन हमारे पौराणिक कथाओं को काल्पनिक कहने वाले लोगों ने मनगढ़ंत कथा बना कर यह झूठ प्रचारित किया की ययाति नन्दन पुरू के वंश में उत्पन्न राजा दुष्यन्त और उनकी पत्नी शकुन्तला के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है।


दुष्यन्त नन्दन भरत को जब अपने पूर्वज़ों का वंश चलाने के लिए कोई पुत्र नहीं हुआ तब वे बृहस्पति नन्दन भारद्वाज ऋषि को अपना दत्तक पुत्र बना लिये थे। लेकिन भारद्वाज ऋषि ने राज सुख के मोह में न पड़ कर अपने प्रतिपालक पिता का वंश चलाने के लिए पुत्रेष्ठी यज्ञ किये, तब जाकर राजा भरत के द्वारा एक पुत्र का जन्म हुआ था। जिसे अपना अधिकार सौंप कर भारद्वाज ऋषि पुनः अपने पिता बृहस्पति देव के लोक में लौट गये थे। इस कथा के अनुसार दुष्यन्त नन्दन भरत की ऐसी कोई उपलब्धि प्रतीत नहीं होती है जिसके कारण उनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा होगा। जबकि वायु पुराण की कथा में उल्लिखित श्लोकों के अनुसार आदित्यों के जन्म से पहले ही भरत नामक ऋषि का जन्म हो चुका था।


संलग्न श्लोकों को देखें :

सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।

अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलं।। 

प्रियव्रतोऽअभ्यषिञ्चतं जम्बूदीपेश्वरं नृपम्।

तस्य पुत्रा बभूबुर्हि प्रजापतिसमौजसः।। 

ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्य किम्पुरूषो अनुजः।

नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधतः।। 

                             - वायु पुराण ३१-३७,३८


वायुपुराण, हरिवंश पुराण व महाभारत आदि ग्रन्थों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि विराज देव के पुत्र विराट पुरुष ब्रह्मा जी थे। उनके पुत्र स्वयंभू मनु और पुत्रवधु देवी शतरूपा के ज्येष्ठ पौत्र जम्बूदीपेश्वर राजा प्रियवर्त और उनकी पत्नी बहिर्ष्मति मालिनी को कोई पुत्र नहीं हुआ था। तब जम्बूदीप को सींचने वाले राजा प्रियवर्त ने अपनी कन्या बभूबुर्हि के ज्येष्ठ पुत्र महाबलि अग्निन्ध्र को अपना दत्तक पुत्र मान कर जम्बूदीप का नृप बना दिये थे। ये अग्निन्ध्र! अपनी धर्म परायणता के कारण सुब्रत के नाम से भी प्रसिद्ध थे। तत्पश्चात महाबलि अग्निन्ध्र के पुत्र नाभि हुए तथा नाभि और उनकी पत्नी मेरू देवी से ऋषभ नामक जिस पुत्र का जन्म हुआ वे अपनी प्रजावत्सलता के कारण भरत के नाम से तथा उनके द्वारा चलाई गई रिति नाभिरिति के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जबकि इसी भरत के पुत्र सुमति के द्वारा शासित सप्त द्वीपों से आवर्त हिमालय तक की भूमि भारतवर्ष के नाम से विख्यात हुआ। भारतवर्ष का अर्थ है भरत के वर के कारण शासित प्रदेश।... ॐ 

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

गोमन्त पर्वत के प्रागैतिहासिक साक्ष्य छिपे हैं मलेशिया में

गोमन्त पर्वत की किनाबालु नामक पर्वत चोटी

गोमन्त पर्वत और उसकी गुफााओं के बारे में जिस तरह के संकेत दिये गये हैं हरिवंश पुराण व महाभारत नामक ग्रन्थों में वैसाा ही पर्वत और गुफाओं का समुह है मलेशिया के इस पर्वत पर। 


गोमन्त पर्वत की किनाबालु नामक पर्वत चोटी

गोमन्त पर्वत की विभिन्न चोटियों तक जाने वाली गोमन्तक (गोमन्तोंग) गुफाएं 

मलेशिया की ये गुफाएं जिस तरह जली हुई है उसका उल्लेख हरिवंश पुराण व महाभारत नामक ग्रन्थों में वर्णित गोमन्त पर्वत की तलहटी में स्थित गुफाओं को सूखे हुए वृक्षों और काष्ठ आदि से भर कर गोमन्त पर्वत के जंगलों में चारों तरफ से आग लगाने के बाद दिखने वाले जिस तरह के दृश्य का उल्लेख किया गया है वह गोमन्तोंग नामक गुफाओं में आज भी दिखाई देता है। इस गुफा में प्रवेश करते ही उस काल में लगी आग की भयावहता का आंकलन आज भी किया जा सकता है।

प्रागैतिहासिक मलेशिया में महाभारत के साक्ष्य : 

महाभारत युद्ध में वृहद पैमाने पर हुए परमाण्विक विस्फोटों के कारण ही हीमग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जल सतह इतना बढ़ गया था कि द्वारका रातों-रात डूब गया था। द्वारका की तरह ही विश्व के अन्य भागों में भी कम ऊंचाई वाले भूमि पर स्थित हजारों गाँव और नगर डूबे होंगे। यह बात अलग है कि इसके प्रमाण हमारे पास नहीं हैं। लेकिन विश्व की लगभग सभी सभ्यताओं के लोग जल प्रलय की घटना को अलग-अलग कहानियों के द्वारा स्वीकार करते हैं। इनमें क्रिश्चियन और इस्लाम धर्म के लोग भी हैं। लेकिन ये लोग वेदों और पुराणों की कथा को झूठा और काल्पनिक कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित देवी-देवताओं की कथा, सहस्र कोटी युग से ब्रम्हाण्ड का अस्तित्व, निश्चित काल की अवधि समाप्त होने के बाद होने वाले प्रलय और सृष्टि के चक्र की बातों सहित अयोध्या के राजा राम और उनके द्वारा बनवाये गये सेतु तथा द्वारकाधीश कृष्ण और उनके द्वारा बसाये गये द्वारका नामक नगर के समुद्र में डूबने की कथा को भी काल्पनिक कह कर हिन्दुओं का मजाक उड़ाते थे। लेकिन जब जल प्रदुषण के कारण होने वाले नुकसान का पता लगाने के लिए किये जाने वाले अनुसन्धान के क्रम में भारतीय वायु सेना के लोगों को पुराणों में वर्णित स्थान पर समुद्र में जल सतह के नीचे डूबे हुए एक भव्य नगर के अवशेषों का पता चला तब भारत सरकार ने उन पुरातत्विक साक्ष्यों के नमूनों का जाँच करने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और श्रीलंका की सरकारों को भी आमंत्रित किया था। ताकि भारतीय सभ्यता और संस्कृति की प्राचीनता पर सन्देह करने वाले लोगों को पुराणों और वेदों में वर्णित कथाओं पर विश्वास हो सके। उस निमंत्रण के बाद विश्व के कई संस्थान भौगोलिक अन्वेषण के लिए भारत सरकार से द्वारका के भूमिगत अवशेषों के नमुने माँग कर ले गये। इस घटना के बाद वैदिक ग्रन्थों का मजाक उड़ाने वाले लोगों को द्वारका के अस्तित्व पर विश्वास हुआ। लेकिन द्वापर युग में हुए महाभारत युद्ध के बाद अप्रत्याशित रूप से बढ़े हुए जल सतह के कारण और कितनी सभ्यता लुप्त हुई इसका पता करने में किसी ने रुचि नहीं लिया। लेकिन महाभारत ग्रन्थ में वर्णित स्थानों के बारे में पता करने के दौरान काफ़ी खोजबीन करने पर भी जब मुझे कई स्थान अनुवादित पुस्तकों में बताये गये दिशा में नहीं मिले तो मुझे भी पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित कई घटनाएं और घटना स्थल मनगढ़ंत और काल्पनिक लगने लगे थे। लेकिन जब मुझे इस बात की जानकारी हुई कि लोगों की नजरों से ओझल द्वारका के अवशेष जल सतह के नीचे दिखाई देने के बाद वैदिक संस्कृति को मनगढ़ंत कहने वाले लोगों को भी उसके अस्तित्व पर विश्वास हो गया है, तब मेरे मन में यह ख्याल आया कि हो सकता है कि इन ग्रन्थों में वर्णित जो जगह आज नहीं दिख रहे हैं, वे भी द्वारका की तरह ही कहीं खो गया हो। मेरे जेहन में इस ख्याल के आते ही मैंने पौराणिक ग्रन्थों को दूबारा पढ़ना शुरू किया। द्विअर्थी और अस्पष्ट वाक्यांशों को गहराई से पढ़ने के दौरान मुझे जैसी अनुभूति हुई उसके अनुसार अपने अनुसन्धान के कार्य को बढ़ाता रहा। जिसका परिणाम यह हुआ कि वेदों में वर्णित ऐसे कई जगहों का पता लगा लिया, जो वर्तमान में अन्य नामों से पहचाने जाने के कारण हमारी पहुंच से दूर हो गया था। लेकिन उनकी पहचान वहाँ के लोगों की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को बचा कर रखने वाले कबीलों के रीति-रिवाजों की वैदिक काल के रीति-रिवाजों से समानता और भौगोलिक स्थानों यथा गाँव, नगर, नदी, पर्वत और सरोवरों के नामों का कारण पता करने के लिये योगनिद्रा के दौरान किये जाने वाले मन्थन से अतीत में छिपे हुए राज खुलने लगे। विलुप्त वैदिक नगरों, सरोवरों, पर्वतों और सभ्यताओं के बारे में आगे जो बताने जा रहा हूँ, उस पर हो सकता है कि आपको भी यकीन न हो। लेकिन संयम पूर्वक पूरे आलेख को पढ़ने और इसमें बताये गये जानकारियों के आधार पर ईमानदारी पूर्वक जाँच करने पर मेरी बातों पर जरूर यकीन हो जाएगा। ऐसा मेरा दावा है। 


सबसे पहले आदि ग्रन्थ महाभारत में वर्णित गोमन्त पर्वत के बारे में जानते हैं। यह कहाँ है? इसे लेकर लोगों में काफी भ्रान्तियां हैं। आदि ग्रन्थ महाभारत के श्लोकों में निहित मूल भाव को समझे बगैर श्लोकों को सरसरी निगाह से पढ़ने वाले लोग यह दावा करते हैं कि वह गोमन्त पर्वत जहाँ मगध राज जरासंध और कृष्ण-बलराम की जोड़ी ने युद्ध किया था, वह सह्याद्रि की पर्वत श्रृङ्खलाओं में स्थित है। लेकिन इसकी तलाश करने पर गोमन्त पर्वत नामक एक भी पर्वत चोटी सह्याद्रि में नहीं दिखती है। कुछ लोग महाराष्ट्र के पश्चिमी तट पर स्थित गोआ नामक गाँव को गोमन्त कहते हैं। लेकिन हरिवंश पुराण व महाभारत नामक ग्रन्थ में गोमन्त की चोटी को बादलों से भी ऊपर बताया गया है। ऐसे में समुद्र की सतह से सामान्य ऊँचाई पर स्थित गोआ नामक प्रान्त गोमन्त पर्वत नहीं हो सकता है। सह्याद्रि के पहाड़ों में सबसे ऊँची चोटी वाला "कलशुबाई चोटी" जो महाराष्ट्र के इंदौर और ओखला के बीच बारी नामक गाँव के पास स्थित है उसकी ऊँचाई भी सरकारी आंकड़ों के अनुसार मात्र १६४६ मीटर है। जबकि गुगल के अनुसार मात्र १४६० मीटर है। ऐसे में इस पर्वत को भी मेरू पर्वत की तरह विशाल दिखने वाला गोमन्त पर्वत नहीं कहा जा सकता है। हाँ यह हो सकता है कि महाभारत ग्रन्थ में वर्णित वेणा नदी को पार कर के परशुराम जी के साथ श्रीकृष्ण और बलराम इसी पर्वत पर आये होंगे। लेकिन यहाँ पर आने के बाद आकाश मार्ग से गोमन्त नामक उस पर्वत पर गये होंगे जहाँ कई देवताओं को अप्सराओं के साथ दिव्य गति से विचरण करते हुए उन्होंने देखा था। 


यह गोमन्त पर्वत या पुराणों में वर्णित इस पर्वत के लक्षणों से युक्त एक भी पर्वत सह्याद्रि की पर्वत चोटियों के दक्षिणी भाग में स्थित वनवासी जनपद के आस-पास भी नहीं दिखा। इसके बावजूद लोग जबरन दावा करते हैं कि गोमन्त पर्वत! सह्य पर्वत की चोटियों में से ही उस चोटी का नाम है जो अपने समय में मेरूगिरी की तरह ही ऊँचा था। हरिवंश पुराण के अध्याय ४० और ४१ में गोमन्त पर्वत के बारे में सिर्फ़ यही बताया गया है कि "भृगुवंशी परशुराम जी वसुदेव नन्दन श्रीकृष्ण और बलराम के साथ करवीरपुर में प्रवहित होने वाली वेणा नदी को अपनी भुजाओं से ही पार किये। तत्पश्चात दो पर्वतों के मध्य भाग से प्रवाहित होने वाली नदि के किनारे से चलते हुए विभिन्न पर्वतों की कन्दराओं में रहने वाले तपस्वीयों के दर्शन करते हुए सह्य पर्वत की सबसे ऊँची चोटी पर जा पहुंचे। वहाँ से नीचे उतर कर गुफा में प्रवेश कर के गोमन्त पर्वत पर जा पहुंचे। वह पर्वत आकाश से भी ऊपर तक उठी हुई थी और दूसरी मेरू जैसी जान पड़ती थी। उस पर्वत पर उन्होंने कई देवताओं और अप्सराओं को विचरण करते हुए देखा था।" लेकिन इस कथा में यह नहीं बताया गया है कि वे लोग सह्य पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पर से कहाँ पर और किस दिशा में उतरे। यह भी नहीं बताया गया है कि परशुराम जी के साथ कृष्ण और बलराम किस गुफ़ा से होते हुए गोमन्त पर्वत पर पहुंचे थे। जो पर्वत आकाश से भी ऊंची थी वहाँ तक पहुंचना किसी गुफा के अन्दर प्रवेश कर के कैसे सम्भव है? इसे भी स्पष्ट नहीं किया गया है। 


जिन दिनों मैं महाबोधि सोसायटी औफ इण्डिया के द्वारा थाईलैण्ड में आयोजित विपश्यना प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने के लिए थाईलैण्ड गया हुआ था और श्रीलंकाई बौद्ध सन्त पीएस सिवली थेरो के सानिध्य पाने के बाद एक दिन ध्यान में डूबा हुआ था, मुझे ऐसा महसूस हुआ कि कोई शक्ति मुझे धरती के अन्दर से आती हुई प्रकाश की ओर बुला रही है। उस दौरान मैंने जो कुछ भी देखा था उसके बारे में बताने पर लोगों को विश्वास नहीं हुआ। लेकिन उस घटना के बाद मुझे बार-बार द्वीपों से घिरे हुए पर्वत पर युद्धों के दृश्य दिखाई देते थे। इसके कारण लोगों की सलाह पर मुझे नींद की गोली तक लेना पड़ गया था। लेकिन उस दैविक दर्शन को जिसे लोग मेरा स्वप्न कहते थे उसे भुला नहीं सका और उसके रहस्य को जानने के लिए बार-बार योगनिद्रा में डूब कर भ्रमण करता रहा। तीर्थाटन करना और ईश्वरीय प्रेरणा से पौराणिक और उपेक्षित जगहों पर भी घुमना शुरू किया। काफ़ी तलाश करने के बाद एक दिन अचानक पता चला कि गोमन्त पर्वत एक ऐसे मार्ग पर स्थित है जिसके मार्ग में आने वाले कम ऊंचाई की विशालकाय भूमि महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद आये जल प्रलय में डूबने से ऊंचाई पर स्थित भू-क्षेत्र कई द्वीपों का रूप धारण कर के थाईलैण्ड, मलेशिया, इण्डोनेशिया, फीलिपिन्स, कम्बोडिया आदि कई द्वीप समूहों वाले देशों के रूप ले चुके हैं। उन्हीं द्वीपों में से पश्चिमी मलेशिया के पूर्वी दिशा में स्थित बोर्नियो नामक द्वीप के उत्तरी भाग में मलेशिया का सबा (Sabah) और सरवाह नामक राज्य है तो दक्षिणी भाग में इण्डोनेशिया का कालिमन्तन नामक राज्य संघ। इसी एक सुदूरवर्ती द्वीप के सबा (Sabah) नामक राज्य में हमारी नजरों से छुपा हुआ था पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित गोमन्त पर्वत। 


हरिवंश पुराण की कथा को गौर से पढ़ने और गोमन्त पर्वत के आस-पास के द्वीपों की स्थिति देख कर यह समझते देर नहीं लगा कि जल प्रलय से द्वारका के डूबने के पहले तक वर्तमान थाइलैण्ड, मलेशिया, इण्डोनेशिया आदि द्वीप बन चुके देशों की यात्रा जलयानों का इस्तेमाल किये बगैर अश्वारोही रथ के द्वारा भी किया जा सकता था। इस का संकेत हरिवंश पुराण व महाभारत के उस प्रसंग से मिलता है जब गोमन्त पर्वत की तलहटी में हुए युद्ध में पराजित होकर जरासंध के भागने के बाद चेदिराज दमघोष ने अपने दो रथ श्रीकृष्ण को देते हुए कहा था कि "ये दोनों रथ मैंने तुम्हारे लिए ही बनवाया है। मेरे तरफ़ से इसे स्वीकार करो। मजबूत पहिया, धूरा और कूबर वाले इस रथ में जुते हुए घोड़े दिव्य और तीव्रगामी हैं। इस पर सवार होकर जितनी जल्दी हो सके अपने बन्धुओं के राज्य करवीरपुर में चलो। मृत मनुष्यों के रक्त और शवों की कीच जम जाने से यह क्षेत्र मनुष्यों के रहने लायक नहीं है। अतः जल्द से जल्द यहाँ से वापस चलो।" 


 जिस तरह बहुमंजिली अट्टालिकाओं वाला द्वारका समुद्र में ७० से १५० फीट नीचे तक डूब कर मिथक बन गया था, उसी तरह द्वारका की ऊंचाई तक विश्व के सभी भू-भाग डूब गये होंगे। इसके कारण द्वारका की तरह कई विश्व की अन्य आबादी भी अपने बन्धु-बान्धवों के साथ डूब कर अपने स्मृतिचिन्हों को मिटा दिये होंगे। पापुआ न्युगिनी और अन्दमान निकोबार जैसे कई द्वीप उसी जल प्रलय के कारण हमारी आधुनिक सभ्यता से कटी-छटी दिखाई देती है। ऐसी ही घटना के कारण गोमन्त पर्वत और उससे जुड़ी यादें हमारे स्मृतियों की धरोहरों के रूप में संचित पौराणिक ग्रन्थों के लेखकों और अनुवादकों की पहुंच से भी दूर हो गये थे। लेकिन उस जल प्रलय में डूबने से बचे हुए ऊँचे-ऊँचे जगहों को एक ही भूमि पर स्थित होने के बावजूद अलग-अलग द्वीपों के रूप में ही सही, मैं उसके अतीत को स्पष्ट देख रहा हूँ। उसी तरह जल प्रलय में डूबने से बचे हुए भौगोलिक साक्ष्यों और बचे हुए प्राचीन जन-जाति के पारम्परिक रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर विलुप्त हो चुके वाणासुर और वरूण के लोक की तरह पहले कार्तिकेय और जलन्धर के बीच हुए युद्ध भूमि और उसके बाद जरासंध और श्रीकृष्ण के बीच हुए युद्ध भूमि वाले गोमन्त पर्वत को भी ढूंढ लिया है। 


यह गोमन्त पर्वत है मलेशिया के सबा (Sabah) नामक उस राज्य में जो कालिमन्थन नामक राज्य के पूर्वोत्तर दिशा में स्थित है। कृष्ण और बलराम के द्वारा इस राज्य को रक्त और शव की कीच से पाट कर त्याग दिया गया था। इसके कारण गोमन्त पर्वत के आस-पास की भूमि "शव क्षेत्र" के नाम से कुख्यात होने के कारण आज भी उसी पौराणिक नाम से पहचाना जाता है। जो अपभ्रंश के कारण अब सबा (Sabah) कहलाता है। हालांकि वहाँ के स्थानीय लोग सबाह का अर्थ प्राचीन आत्माओं की भूमि कहते हैं। जो गोमन्त पर्वत की तलहटी में हुए पौराणिक युद्ध स्थल पर मारे गये लाखों लोगों की भटकती हुई आत्माओं वाले नगर की विस्मृत हो चुकी यादों का परिणाम है। 


जिस गोमन्त पर्वत पर कृष्ण और बलराम ने भृगुवंशी तपस्वी परशुराम जी की मदद से सुदर्शन चक्र, कौमोदी मूसल, संकर्षण हल, नीलाम्बर और स्वर्ण मुकुट प्राप्त कर के वैष्णव दिव्यास्त्रों का पहली बार संधान किये थे, उनकी याद में गोमन्त पर्वत को वहाँ के स्थानीय लोग "किनाबालु" कहते हैं। जिसका अर्थ स्थानीय लोग प्राचीन आत्माओं की भूमि कहते हैं। मगर मेरे ख्याल से "कृष्णा" के नाम से विख्यात श्रीकृष्ण और बलभद्र, बलराम तथा संकर्षण के नाम से विख्यात "बल" के संयुक्त नाम कृष्णा-बल का अपभ्रंश है मलेशियाई शब्द "किनाबालु"। ऐसा भी हो सकता है कि अपभ्रंशित "किनाबालु" का मूल नाम "कृष्णबल" रखा गया हो। जिसका अर्थ है कृष्ण का बल। यह सच भी है, गोमन्त पर्वत पर आने के बाद ही वसुदेव नन्दन श्रीकृष्ण को दिव्य शक्तियों वाले वैष्णव आयुध प्राप्त हुए थे तथा इसी पर्वत पर भृगुवंशी परशुराम जी ने श्रीकृष्ण में सोयी हुई वैष्णव शक्ति को जगाये थे। 


इस वर्णन से यह प्रमाणित नहीं होता है कि "किनाबालु" नामक यह पर्वत गोमन्त पर्वत ही है। लेकिन इसी पर्वत की तलहटी में स्थित जले हुए गुफाओं की स्थिति तथा आदिग्रन्थ महाभारत में वर्णित गोमन्त पर्वत की तलहटी में स्थित गुफाओं और जंगलों में जरासंध की सेना के द्वारा आग लगाने की घटना का वर्णन देखने के बाद यकीन हो जाएगा कि "किनाबालु" नामक पर्वत ही गोमन्त पर्वत है। यदि इस पर भी यकीन न हो तो इस पर्वत के पूर्वोत्तर भाग में स्थित जिस प्राचीन गुफा में सूखे हुए वृक्षों और काष्ठ के टुकड़ों को भरकर आग लगाने से उस पर्वत के प्रश्तर-खण्डों के टूट-टूट कर गिरने के प्रसंग का प्रमाण स्थानीय लोगों में "गोमन्तोंग" के नाम से ही प्रसिद्ध इस गुफा को गोमन्त पर्वत का ही अंग मानने से इंकार नहीं कर पायेंगे। जिस पर्वत की तलहटी में गोमन्तोंग नामक यह गुफा स्थित है उस पर्वत की सबसे ऊंची चोटी वाले "किनाबालु" पर्वत की ऊंचाई और इस चोटी को धारण करने वाले पर्वत की तलहटी का विस्तार भी पौराणिक ग्रन्थों में वर्णित गोमन्त पर्वत की तरह ही है। इसकी ऊंचाई ४६६० मीटर तथा विस्तार ..... वर्गमीटर है।


मलेशिया के सबा प्रान्त के दक्षिणी दिशा में स्थित जो प्रान्त "कालिमन्थन" के नाम से प्रसिद्ध है, वह संस्कृत शब्द "कालमन्थन" का अपभ्रंश है। सम्भवतः गोमन्त पर्वत के दक्षिणी दिशा में स्थित इसी भूभाग पर जरासंध और श्रीकृष्ण के समर्थकों के बीच महाभारत युद्ध के पहले वाला महायुद्ध हुआ था। इसी स्थल पर जरासंध के गर्व को मथ कर भागने के लिए विवश किया गया था। उस युद्ध के पहले हुए सागर मन्थन का स्थान भी कालिमन्थन की यही भूमि रही हो। इस मामले में सच्चाई क्या है, उसका पता लगाने के लिए और शोध की आवश्यकता है।

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Prehistoric_Malaysia

कुम्भी जाति और बड़गायां का अर्थ

कौन हैं कुम्भी बारी, कम्मा बारी और बड़गायां परिवार के नाम से प्रसिद्ध कौशिक गोत्रीय समाज?  कुम्बी के नाम से प्रसिद्ध था पौराणिक अफ़्रीका महा...