कुम्भी बैस बनाम स्लाविक रोडनोवर्स
स्लाविक रोडनोवर्स! इजिप्ट और रोमन साम्राज्य से विस्थापित हुए कुम्भी मूल के वे लोग हैं जो न केवल आज भी अपने पुरखों की परम्परागत संस्कृति को बचाये हुए हैं बल्कि आधुनिकता के नाम पर अपनी मूल संस्कृति को छोड़ते जा रहे कौशिक गोत्रीय कुम्भी समाज के लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़े रखने के लिए हर सम्भव प्रयास करने के लिए प्रयत्नशील हैं। इस समुदाय के कारण ही रूस के कोमी राज्य में रहने वाले कुम्भी जाति के लोग अपने घरों व मन्दिरों में प्रवेश करने के लिए सबसे पहले अपने बायें पैर को आगे बढ़ाते हैं। इसी तरह अपने विजय की आकांक्षा या शुभ परिणाम की कामना करते हुए सभी तरह के अभियान पर प्रस्थान करने के लिए सबसे पहले अपने बायें कदम को आगे बढ़ाना ही शुभ समझते हैं। भारतीय कुम्भी समुदाय की तरह रूस के कोमी नामक राज्य में रहने वाले कोमी समुदाय के लोग भी ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करने के लिए मुण्डन करवाते हैं, मगर माथे पर धारण करने वाले केशशिखा को यूक्रेन, स्कॉटलैण्ड और आयरलैण्ड में रहने वाले कौशिक गोत्रीय कुम्भी समाज की तरह ही बायीं ओर झुकाये रखते हैं या बायीं ओर लपेटते हुए अपनी केशशिखा बाँध कर अपने पुरखों की तरह वाममार्गी संस्कृति का अनुयायी होने का स्मृत चिह्न धारण करते हैं। अपने पुरखों की तरह बायें कानों में कुण्डल पहनते और इसाई बहुल रसीयन समाज से घिरे होने के बावजूद अपने पारम्परिक मूर्ति पूजा और रीति-रिवाजों का आज तक पालन करते हैं।
इनकी मूल भाषा भले ही बदल गयी है लेकिन वंशानुगत संस्कारों के प्रति अपने श्रद्धा, विश्वास और आस्था को बचाये हुए हैं। खुद को अपने कुल देवता कपोत (कबूतर) का वंशज़ समझ कर न तो कपोत का माँस खाते हैं न ही इसका शिकार करते हैं। विदित हो की शिव के अंश से कार्तिकेय भगवान के जन्म को सफल बनाने के लिए कौशिक विश्वामित्र भगवान और उनकी पत्नी चक्षुस्मति देवी के गर्भ से उत्पन्न पुत्र अग्निदेव ने कपोत का रूप धारण कर के जो लीला किया था उसकी कथा शिव पुराण में उल्लिखित है। इस ग्रन्थ में वर्णित अग्निदेव की कथा के अनुसार नर्मदा नदी के किनारे स्थित नर्मपुर की नाग कन्या के गर्भ से कौशिक विश्वामित्र भगवान ने गृहपति नामक जिस पुत्र को जन्म दिये थे वही बाद में अग्निदेव के नाम से प्रसिद्ध हुए। पुत्र प्राप्ति के लिए जिस समय भगवती पार्वती! भगवान शिव के साथ विहार कर रही थी उसी समय उनके गुफा द्वार पर अचानक पहुंचे देवताओं ने बहुत इन्तज़ार करने पर भी जब यह पाया कि शिव जी अपनी गुफा से बाहर नहीं आ रहे हैं तब कौशिक नन्दन अग्निदेव से कहा था कि आप कपोत का रूप धारण कर के उनकी गुफा में जायें और अन्दर की घटना देख कर हमें बतायें कि शिव जी क्या कर रहे हैं? वे हमारे आवाज़ देने पर भी बाहर क्यों नहीं आ रहे? देवताओं के आग्रह करने पर कपोत रूप में अग्निदेव को अपनी गुफा में आने की आहट महसुस करते ही पार्वतीजी के साथ आलिंगनबद्ध शिव जी अपनी शैय्या से अचानक उतर गये थे, जिसके कारण उनका वीर्य उनकी शैय्या के बगल में भूमि पर ही गिर गया था। इसके कारण देवताओं के आग्रह पर कपोत का रूप धारण कर के भगवान अग्निदेव ने शिव जी के वीर्य को सावधानी पूर्वक उठा कर भगवती गङ्गा के गर्भ में स्थापित कर दिया था। उनके प्रयासों के कारण ही देवी गङ्गा ने अपने गर्भ से शिवपुत्र कार्तिकेय जी को उस जगह पर जन्म दिया था जहां अग्निदेव की पत्नियों स्वाहा, स्वधा और विशाखा से उत्पन्न पुत्रों शरवा, विशरवा और नैगमेय का भी जन्म और पालन-पोषण हुआ था। इसके कारण ही रसीया में स्थित कोमी गणराज्य में रहने वाले कौशिक गोत्रीय अग्निदेव के वंशज़ खुद को कपोत वंशी बताते हुए अपना जातिय चिह्न सुनहला कबूतर बताते हैं।
| रूस के कोमी गणराज्य का राज्यचिह्न : सुनहरा कपोत |
इनकी कुल देवी बन्दी मइया और सत्यवती काली के नाम से विख्यात वह देवी हैं, जिनके प्रयासों के कारण उनकी माता ने कौशिक गाधि बाबा के वंश को बढ़ाने के लिए कौशिक विश्वामित्र भगवान को जन्म दिया था। अफ्रीका की स्वाहिली भाषा में पिता की बहन को बन्दी कहा जाता है। इसे ही भारतीय हिन्दीभाषी समुदाय के द्वारा फुआ और बुआ तो मुस्लिम समुदाय के द्वारा खाला भी कहा जाता है। इसके कारण ही कुम्भ देश के नाम से विख्यात अफ़्रीकी भूभाग से विस्थापित कौशिक गोत्रीय अग्निवंशियों की कुल देवी सत्यवती काली मइया को कौशिक गोत्रीय लोग बन्दी मइया के नाम से भी पूजते हैं। चाहे ये लोग विश्व के किसी भी भाग में रहें अपनी कुल देवी बन्दी मइया अर्थात् भगवती काली मइया के प्रति अपनी आस्था को आज तक बनाये हुए हैं। शिवांश कार्तिकेय जी के प्रतिपालक के रूप में विख्यात भगवान अग्निदेव के स्वरूप कबूतर के प्रति आस्था भी सराहणीय है।
शिव भक्ति के कारण ब्रह्मर्षि कहलाने वाले कौशिक विश्वामित्र भगवान को शिव पुराण में रूद्रावतार भी कहा गया है। इसके कारण कौशिक गोत्रीय कुम्भी समाज के द्वारा बसाये गये रसीयन गणराज्य कोमी में कुम्भी बैस कहलाने वाले बड़गायां समाज के लोग रोडनोवर्स भी कहलाते हैं। इनकी आबादी रसीयन आबादी का मात्र १% ही बचा है। जबकि कोमी मूल के ही अन्य लोगों की आबादी रसीयन आबादी का ३०% है। ये लोग रोजी-रोटी के चक्कर में आधुनिक और शहरी कहलाने के लिए रसीयन शहरों में रहने वाले इसाईयों के साथ रहते-रहते इसाई धर्म को ही अपनाते जा रहे हैं। हालांकि रसीयन देशों के लोग भी ११वीं शताब्दी तक वैदिक सनातन धर्म को ही मानते थे। लेकिन उन लोगों के एक सनकी राजा के जिद के कारण उनके राज्य के नागरिकों को भी इसाई बनने के लिए मजबूर होना पड़ा था। हालांकि अब इसाई धर्म की शुरुआत करने वाले लोगों की मनमानी देख कर रसीयन देशों के लोग सनातन धर्म की ओर लौटने लगे हैं। लेकिन अपने वंश और गोत्र से सम्बन्धित अपनी मूल संस्कृति को भुला चुके हैं। इसके कारण अपने संस्कृति के बारे में जानने के लिए भारतीय सन्तों से सम्पर्क स्थापित करने के लिए भारत के तीर्थ स्थलों में भटकते हुए उन्हें देखा जा सकता है। ऐसे लोगों को उनका असली इतिहास बताने का प्रयास कौशिक कंसल्टेंसी इंटेलीजेंस ब्यूरो नामक मेरा संगठन कर रहा है। जैसे ही मुझे इस बात की जानकारी हुई कि रूस में भी हमारे कुम्भी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं, उनके बारे में जानकारी जुटाने लगा था। विदित हो की सबसे प्राचीन जन-जाति वाले कोमी समुदाय की आबादी का विकास दर रूस में रह रहे अन्य लोगों की अपेक्षा कोमी राज्य में भी लगातार घटती जा रही है। यही हाल हमारे देश भारत सहित तमाम एशियाई, अफ्रिकी, अमेरिकी, यूरोपीय और ऑस्ट्रेलियाई देशों में भी रहने वाले कुम्भी समुदाय की भी है। जो इस समाज के अस्तित्व के लिए चिन्ताजनक है।