सोमवार, 15 अप्रैल 2024

कुम्भी जाति और बड़गायां का अर्थ


कौन हैं कुम्भी बारी, कम्मा बारी और बड़गायां परिवार के नाम से प्रसिद्ध कौशिक गोत्रीय समाज? 


कुम्बी के नाम से प्रसिद्ध था पौराणिक अफ़्रीका महाद्वीप

 बारी, बड़गायां, बड़गामा, बर्लिन, बर-एइली (बरैली), ब्राज़ील और बर्जिनिया जैसे नाम आपने भी सुना होगा। ये नाम विभिन्न देशों, राज्यों और नगरों के नाम भले ही हैं, लेकिन ये अपनी बहादुरी और सम्पन्नता के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध कौशिक और कौशिक गोत्रीय कुम्भी बैस कहलाने वाले सबसे प्राचीन राजवंश के वंशज़ों की जाति- "बारी जाति" के सूचक हैं। इसके कारण कौशिक गोत्रीय लोगों की एक जाति दक्षिणी भारत में कम्मा वारु के नाम से तो यूरेशिन देशों में Cossacks and Comers के नाम से आज भी प्रसिद्ध हैं। यही जाति मलय देश के नाम से प्रसिद्ध वर्तमान देश इण्डोनेशिया के बाली और जावा नामक द्वीपों सहित मलेशिया के पूर्वी राज्यों, उत्तर भारतीय राज्योंं, अफ़्रीकी देशों - घाना, मौरितानिया, केन्या, जिम्बाब्वे और नाइजीरिया सहित विभिन्न आस्ट्रेलियाई देशों में भी कहीं पर कुम्भी तो कहीं पर कुम्बी कहलाती है। 


इसी इण्डोनेशियाई द्वीप के पश्चिमी तट पर रहने वाले कौशिक गोत्रीय ब्राह्मण परिवार के चार ब्राह्मणों को सह्याद्रि के तटवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले नम्बूदरी ब्राह्मणों ने बुला कर बौद्ध धर्म और जैन धर्म के कारण विलुप्त हो रहे सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु बसाया था। बाद में कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों के साथ अपनी बेटियों का विवाह करवा कर सह्याद्रि की जो तटवर्ती भूमि दान कर दिया वह कौशिक-कोड नामक एक प्रसिद्ध व्यापारिक बन्दरगाह बना था। दक्षिणी भारत में आने वाले विधर्मियों के द्वारा जब नम्बूदरी ब्राह्मणों को परेेशान किया जाने लगा तब जावा से बुला कर बसाये गये चारों ब्राह्मणों के वंशज़ों को भी सैन्य सहायता के लिये आमंत्रित किया गया था। लेकिन सुदूरवर्ती क्षेत्र से बार-बार आना सम्भव नहीं था। इसके कारण नम्बूदरी ब्राह्मणों ने दामाद बनाये गये कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों के साथ मिलकर यह निर्णय लिया कि उनके वंश में उत्पन अगला सन्तान पुत्र हो या पुत्री वह क्षत्रिय होगा। उसमें ब्राह्मणोचित संस्कारों के साथ क्षत्रिय संस्कार की भी शिक्षा दी जाएगी। जो हम लोगों का राजा बनेगा। निर्णय के अनुसार उन ब्राह्मणों के वंश में प्रथम उत्पन्न जो सन्तान राजा बना वह पेरुमल कहलाया। उस राजा के वंश में उत्पन्न चेर नामक राजा के नाम पर उनका राज्य भी चेर राजवंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में इस वंश में उत्पन्न केरल नामक राजा के नाम पर चेर राज्य का नाम केरल हो गया। बाद में इसी वंश में उत्पन्न चोल नामक व्यक्ति को सरदार बना कर पेरुमल का सम्मान दिया गया। उनके बाद चेर राज्य के राजवंश में ही उत्पन्न पाण्ड्य नामक युवक को जब पेरुमल बनाया गया तब उनकेे वंशज़ पाण्ड्य कहलाये। ये सभी एक ही वंश से उत्पन्न कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों के वंशज़ हैं। पूर्वी तट पर रहने वाले एक राजा ने जब इनके क्षेत्र में घुस कर बार-बार लूटपाट करने लगा तब इन लोगों ने इण्डोनेशिया के पश्चिमी तटों पर रहने वाले सरदारों को बुला लिया और इस शर्त पर पूूर्व तट के राजा पर आक्रमण किये कि उस राजा का एक किला इण्डोनेशिया से आने वाले सरदारों को भी दिया जाएगा तथा शेष राज्यों सहित अपने राज्य को भी अपने वंशज़ों में बांट दिया जाएगा। शर्तानुसार कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों ने दक्षिणी राज्यों को आपस में बांट लिया जो चेर, चोल और पाण्ड्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। लेकिन बाद में आपसी विवाद के कारण इनकी शक्ति जब क्षिण हो गई तब पड़ोसी शासकों के दरबार में मन्त्री और सरदारी का काम करने लगे। काकतीय साम्राज्य और विजयनगर साम्राज्य में भी यही करते रहेे। मगर मुगलकाल में जिन कौशिक गोत्रीय ब्राह्मणों को बिहार में जाकर शरण लेना पड़ा उनके वंशज़ आज भी बड़गायां वाले कुम्भी बैस वंशीय क्षत्रिय कहलाते हैं। कुुम्भी कहलाने वाले इसी वंश के दक्षिण भारतीय लोग अपने समुदाय को कम्मा कहते हैं तो पश्चिमोत्तर भाारतीय लोग कुमावत कहते हैं। जबकि इसी वंंश की एक शाखा कहींं पर कोमी और कुम्बी कहलाती है तो कहीं पर कुम्बरा भी कहलाती है। हालांकि कुछ लोग कम्बोज़ को भी कुम्भी समुदाय की ही जाति समझते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। क्योंकि कौशिक विश्वामित्र और वशिष्ठ के मध्य होने वाले युद्ध के दौरान कम्बोज़ जाति के लोगों ने कौशिक विश्वामित्र जी के विरुद्ध वशिष्ठ जी का साथ देने वाले लोग थे। जबकि कुम्भी जाति का सम्बन्ध कौशिक विश्वामित्र, भगवान शिव और विष्णु भगवान के भक्त प्रह्लाद के द्वितीय पुत्र कुम्भ के वंशज़ों से है। इस तरह से कुम्भी और कम्बोज़ दोनों अलग-अलग जातिय समुदाय के नाम हैं। 

 कौशिक गोत्रीय कुम्भी जाति का मुख्य कार्य था धर्म रक्षार्थ यज्ञ आदि धार्मिक अनुष्ठान करना, जन-जीवन हेतु जरूरी संसाधनों की व्यवस्था करना और संकट ग्रस्त लोगों की सहायता करने के लिए विश्व के सभी राज्यों से राजस्व की वसूली करना। अपने शौर्य के बदौलत युद्ध, विज्ञान, कला, साहित्य और व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले कौशिक गोत्रीय लोगों के पूर्वज़ भी ब्रह्मदेव के पुत्र ब्रह्मर्षि भृगु के ही वंशज़ हैं। इसके कारण भृगु ऋषि के ज्येष्ठ पुत्र शुक्राचार्य जी के वंश में उत्पन्न कौशिक विश्वामित्र और भृगु ऋषि के कनिष्ठ पुत्र च्यवन ऋषि के वंश में उत्पन्न जमदग्नि ऋषि को भी बाल्मीकि रामायण में भार्गव कहा गया है। उन भृगुवंशियों की ही कुछ जाति बार्गी तो कुछ जातिय समुदाय बरगइयां कहलाती है। जबकि "बड़गायां का मूल अर्थ है बड़ा देव के गाँव के लोग। विदित हो कि छत्तीसगढ़, आन्ध्रप्रदेश और मध्यप्रदेश सहित उसके सीमावर्ती क्षेत्रों के जन जातिय लोगों में भगवान शिव! बड़ा देव के नाम से पूजे जाते हैं। सभी देवी-देवताओं में सर्वश्रेष्ठ और सबसे बड़े होने के कारण महादेव के नाम से भी विख्यात शिव जी के गाँव के लोगों को भी बड़गायां बन्धु कहा जाता है। विशेष रूप से कौशिक विश्वामित्र भगवान की अनुज (सबसे छोटी) पत्नी चक्षुस्मति देवी के पुत्र गृहपति अग्नि देव के वंशज़ों को। क्योंकि शिव जी के गणों में शामिल होते ही कौशिक विश्वामित्र भगवान! नागकन्या चक्षुस्मति देवी और अपने पुत्र के साथ उस दौरान शिव लोक में जाकर बस गये थे जब बाणासुर को दिये गये अपने वचन को निभाने के लिए महादेव शिव जी! बाण लोक में जाकर रहने लगे थे। उस बाण लोक और पौराणिक मन्दार गिरी के निकट कुम्भ लोक में स्थित शिव जी का गाँव होने का संकेत आज भी दिखाई देता है। एक तरह से आज का सम्पूर्ण अफ्रीका महादेव ही कुम्भ देश था; जिसका वहाँ के स्थानीय भाषा में अर्थ सजीला होता है। इसका तात्पर्य यह है कि अफ्रीका का यह महादेश किसी जमाने में सजे-संवरे और खुशहाल लोगों का देश था। संहारक शक्तियों के स्वामी शिव और उनके गणों के प्रति समर्पित भृगुवंशी! बारी के नाम से भी पहचाने जाते थे। 


भारत में ही यह जाति कहीं पर बारी ब्राह्मण कहलाती है, तो कहीं पर बारी बैस। यही नहीं कुछ जगहों पर "बारी" एक जन जाति के नाम से भी पहचानी जाती है। जबकि इटली, माली, सोमालिया, रूस, मलेशिया और औस्ट्रेलिया आदि देशों में बारी नामक राज्यों और नगरों के भी होने का पता चलता है। इन्हें संलग्न तस्वीरों में देख सकते हैं। 

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कौशिक गोत्रीय बारी ब्राह्मणों के द्वारा इटली के दक्षिण-पूर्वी भाग में बसाया गया राज्य "बारी"


दरअसल बारी, बरैली, ब्रज, ब्राजील, बर्जिनिया आदि भौगोलिक क्षेत्रों के नामकरण वहाँ की मूल जाति के नाम पर ही पड़ा है। भारत, अमेरिका, औस्ट्रेलिया और अफ्रीका में रहने वाले अल्पसंख्यक कौशिकों को देखने के बाद रूस, चेकोस्लोवाकिया, यूक्रेन, अजर्बैज़ान, फ्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल और मिश्र में रहने वाले कौशिकों तथा उनकी प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का इतिहास देखने पर आपको यकीन हो जाएगा कि वहाँ की मूल सभ्यता कौशिक गोत्रीय लोगों की जाति की ही सभ्यता है। अर्थात् रूस को आबाद करने वाले लोगों का मूल निवास स्थान कजाख़स्तान के आस-पास का क्षेत्र है। लोक कथाओं तथा ऐहासिक साक्ष्यों के अनुसार भी बारी और बड़गायां कहलाने वाले लोग युद्ध प्रिय कौशिक ब्राह्मणों की जाति हैं। यही लोग कौशेक, कोज़ख और कजाख़ भी कहलाते हैं। रोमन साम्राज्य के मुख्य केन्द्र के रूप में पहचाना जाने वाला विजयन्तियम् नामक जो नगर पहले रोमन साम्राज्य के पूर्वी भाग की राजधानी थी उसे बसाने वाले लोग भी बारी ब्राह्मणों की ही जाति के थे। बाद में इन्हीं विजयन्तियम् के बारी ब्राह्मणों ने संयम और चतुराई के कारण सम्पूर्ण रोमन साम्राज्य को अपने अधिकार में लेकर सम्पूर्ण रोमन साम्राज्य का नाम बदल कर विजयन्तियम् कर दिया था। इस साम्राज्य का विस्तार करने वाले कौशिक गोत्रीय बारी ब्राह्मणों के जिस वंश ने उत्तर भारतीय क्षेत्र से जाकर मार्मरा और एजीएन सी (अग्नि सागर) के पास विजयन्तियम् नामक उपनिवेश को स्थापित किया था, उनका साम्राज्य अपने समय का सबसे शक्तिशाली और विशाल साम्राज्य बन गया था। जिस जगह पर ब्राह्मणशाही क्षत्रिय कहलाने वाले कौशिक गोत्रीय राजा पोरस के बेटों जय और विजय में से विजय पोरस (Main General ccommander of Roman empire later called the Byzantium Emparor Singhbaahu Vijay Porsche) नामक पुत्र ने विजयन्तियम् नामक एक नगर बसा कर विजयन्तियम् साम्राज्य की नींव रखा था, उसी जगह पर विजय पोरस का साथ देने वाले बारी ब्राह्मणों से आबाद एक गाँव बड़गामा के नाम से आज भी स्थित है। हालांकि वह गाँव आज महानगर का रूप ले लिया है, लेकिन अपने वैभवशाली इतिहास की स्मृतियों को आज भी अपने ऐतिहासिक संग्रहालयों, ध्वस्त खण्डहरों और सड़कों के किनारों पर यत्र-तत्र दिखने वाले विशालकाय दीवारों में समेटे हुए है। 

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बारी ब्राह्मणों का बड़गामा नामक गाँव और विजय पोरस द्वारा स्थापित विजयन्तियम् नामक नगर के अवशेष के पास स्थित स्मारक बिजंटाइन सीटी वाल की तस्वीर


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इस्ताम्बुल के कुमलुक में राजमार्ग के किनारे स्थित विजयन्तियम् साम्राज्य के ऐतिहासिक दीवारों की तस्वीर



तुर्की के इस्ताम्बुल में बॉस-पोरस" नामक एक ऐतिहासिक स्थान जो मारमरा सागर से होते हुए कैस्पियन सागर को जल डमरूमध्य से जोड़ने वाला मुख्य बन्दरगाह है, जिसका नामकरण मद्र देश के राजा पोरस के नाम पर उनके पुत्र विजयपोरस (Vijay Porsche) ने रखा था। सिकन्दर और उसके प्रधानमंत्री सेल्यूकस की मृत्यु के बाद रोमन साम्राज्य की बागडोर सिंहबाहु विजय पोरस ने अपने हाथ में ले लिया था। विदित हो कि सिकन्दर की तरह विजय पोरस भी कौशिक गोत्रीय बारी ब्राह्मण ही थे। उनके पहले दक्षिणी तूर्की के कुश्तुन्तुनियां (इस्ताम्बुल) में -४५४ ईसा पूर्व आये यूनानी लेखक हेरोडोटस! जिनका संस्कृत नाम हरिदत्त था, वे भी कौशिक गोत्रीय बारी ब्राह्मण ही थे। कहते हैं कि हरिदत्त को उनके राज्य से ३२ वर्ष की आयु में निर्वासित कर दिया गया था। इसके कारण वे भटकते हुए पर्सियन साम्राज्य के सुषा नामक उस नगर में आकर रहने लगे थे जिसे वेदों में वर्णित महर्षि भृगु की जन्मस्थली कहा गया है। सुषा के दक्षिणी दिशा में ही उर नामक वह नगर स्थित था, जहां की अप्सरा पौराणिक कथाओं में उर्वशी के नाम से प्रसिद्ध थी। विदित हो कि बारी ब्राह्मण! ब्रह्मर्षि भृगु भगवान के वंशज़ों को कहा जाता है तो बड़गायां! भी भृगुवंशियों के लिए प्रयुक्त नाम भार्गवों से आबाद गाँव को कहा जाता है। भृगु ऋषि के पौत्र अत्रि ऋषि के वंशज़ों के कई समुदाय के लोग अत्रिबारी (Atribari) तो अत्रि ऋषि के पौत्र बुध भगवान के वंशज़! बुध भगवान की पत्नी इला के नाम पर इल्बारी कहलाते हैं। जिससे यह प्रमाणित होता है कि बारी जाति भृगुवंशी कहलाने वाले भार्गवों की ही जाति है। 


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पर्सियन साम्राज्य के सुषा (Susa) नामक नगर का नक्शा

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पर्सियन साम्राज्य के उर (Ur) नामक नगर का नक्शा

विजयन्तियम् साम्राज्य की बर्बादी का कारण प्लेग की महामारी और उस बिमारी के थमने के बाद मुस्लिम आक्रान्ताओं के हमलों को बताया जाता है जबकि असली कारण गृह युद्ध था। उस दौरान विजय पोरस के वंशज़ों के जिन कबिलों के लोग दक्षिण भारतीय राज्यों में रहते हुए व्यापारिक कार्यों का संचालन कर रहे थे, वे लोग अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए स्थानीय शासकों की सेना में सम्मिलित होकर राजस्व वसूली व मालगुजारी का कार्य करने लगे थे। इस दौरान कई सरदारों ने स्वतंत्र राज्य भी स्थापित कर लिये थे। ऐसे ही लोगों में एक राजा थे पजवन देव जो पजोन जी के नाम से भी विख्यात हैं। इनके बारे में विस्तृत जानकारी संलग्न लिंक पर देख सकते हैं।https://kaushikwarriors.blogspot.com/2021/03/blog-post.html




आप सोच रहे होंगे कि मैंने चर्चा शुरू किया था महर्षि भृगु और कौशिक विश्वामित्र भगवान के बारे में और चर्चा किसी और की करने लगा। लेकिन ऐसी बात नहीं है मैं आपको उसी विषय पर ले जा रहा हूँ जिसकी जानकारी के लिए आप इस ब्लॉग पर आये हैं। मद्र देश की सिंहपूरा नामक राजधानी के निवासियों के द्वारा तूर्की में आबाद बड़गामा नामक एक प्राचीन गाँव के बारे में ऐसी मान्यता है कि वह गाँव ५००० वर्षों से भी अधिक पुराना है। दक्षिणी भारत में स्थित काकतीय साम्राज्य और महिष्मति साम्राज्य के इतिहास में भी उत्तरी भारत में स्थित सिंहपुरा नामक एक ऐसे राज्य का जिक्र किया गया है जिसका अफ्रीकी निवासियों के साथ गहरा सम्बन्ध था। दरअसल ये अफ्रीकी लोग पौराणिक युग में कुम्भ (कुम्ब) लोक के नाम से विख्यात अफ्रीका के उस देश के निवासी थे जो ईसा पूर्व कुश देश का ही भाग था। चोल साम्राज्य के दौरान भी इन लोगों का अफ्रीका में रहने वाले कौशिक गोत्रीय कुम्भी (कुम्बी) बैस कहलाने वाले लोगों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था। 


महर्षि भृगु का जन्म २.५ लाख ईसा पूर्व ब्रह्मलोक-सुषा नगर (ईरान) में हुआ था। ये आदि ब्रह्मा प्रचेता और मारिषा के पुत्र तथा अपने माता-पिता के सहोदर दो भाईयों में छोटे भाई थे। इनके बड़े भाई अंगिरा ऋषि थे। जिनके पुत्र बृहस्पति! कच और भारद्वाज के पिता तथा देवगणों के गुरु थे। तब भृगु ऋषि के पुत्र शुक्राचार्य जी दैत्यों के गुरु और अत्रि ऋषि के पिता थे। भगवान भृगु ऋषि ने हिमालय के भृृगुप्रश्रवण नामक स्थान पर विश्व का पहला ज्योतिषिय ग्रन्थ "भृगु संहिता" की रचना किये थे। कई जगहों पर भार्गव संहिता के नाम से भी विख्यात इस ग्रन्थ के लोकार्पण तथा गंगा और सरयू नदि के संगम के अवसर पर जीवनदायिनी गंगा नदी को संरक्षण देने के लिए याज्ञिक परम्परा से महर्षि भृगु ऋषि के द्वारा अपने शिष्य दर्दर के सम्मान में शुरू किये गये "ददरी मेला" का भी उल्लेख किया गया है। 


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दिव्या पौलोमी भार्गव मन्दिर



महर्षि भृगु :

महर्षि भृगु की दो पत्नियों का उल्लेख आर्ष ग्रन्थों में मिलता है। इनकी पहली पत्नी दैत्यों के अधिपति हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या थी। जिनसे इनके दो पुत्रों क्रमशः काव्य-शुक्र और त्वष्टा-विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। सुषानगर (ब्रह्मलोक) में पैदा हुए महर्षि भृगु के दोनों पुत्र विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। बड़े पुत्र काव्य-शुक्र खगोल ज्योतिष और यज्ञ कर्मकाण्डों के निष्णात विद्वान हुए। मातृकुल दैत्य वंशियों में इन्हें आचार्य की उपाधि मिली। ये शिव जी के उदर में रहते हुए मृतसंजीवनी मन्त्र की दीक्षा लेकर शिवजी के शुक्र मार्ग से बाहर आने के कारण शुक्र के नाम से प्रसिद्ध हुए तथा सम्पूर्ण संसार में शुक्राचार्य के नाम से विख्यात हुए। भृगु ऋषि के दूसरे पुत्र त्वष्टा-विश्वकर्मा वास्तु के निपुण शिल्पकार हुए। मातृकुल दैत्यवंश में इन्हें ‘मय’ के नाम से जाना गया। अपनी परम्परागत शिल्प दक्षता से ये भी जगत में विख्यात हुए।


महर्षि भृगु की दूसरी पत्नी दानवों के अधिपति पुलोम ऋषि की पुत्री पौलोमी थी। इनसे भी उन्हें एक पुत्र च्यवन और एक पुत्री (...?) का जन्म हुआ था। च्यवन ऋषि का विवाह मुनिवर भृगु ऋषि ने खम्भात की खाड़ी में स्थित भड़ौंच (गुजरात) के राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से किया। राजा शर्याति को पुत्र नहीं था, इसके कारण भार्गव च्यवन और सुकन्या के विवाह के साथ ही भार्गवों का हिमालय के दक्षिणी क्षेत्र में पदार्पण हुआ। च्यवन ऋषि खम्भात की खाड़ी के राजा बने और इस क्षेत्र को भृगुकच्छ और भृगु क्षेत्र के नाम से पहचाना जाने लगा। इस घटना की स्मृति में आज भी च्यवन ऋषि के राज्य क्षेत्र भड़ौच में नर्मदा नदी के तट पर बनवाया हुआ प्राचीन भृगु मन्दिर स्थित है। यहीं पर च्यवन ऋषि ने देवी सुकन्या के गर्भ से अपने पिता की तरह ही ब्रह्म तेज़ से युक्त एक विद्वान पुत्र ऋचिक को जन्म दिये थे, जो ब्रह्म तेज़ से आलोकित होने के कारण और्व के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसी और्व ऋषि के नाम पर सूषा नगर और उर पुर से लेकर सम्पूर्ण कुश द्वीप की भूमि अरब के नाम से पहचाना जाने लगा। यही कारण है कि आज भी सभी अरबियन देशों में वैदिक काल के अवशेष दिखाई देते हैं। 


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भृगु मन्दिर की तस्वीर

च्यवन ऋषि के पुत्र ऋचीक (और्व) का विवाह भृगु ऋषि ने मघवा और महेन्द्र के नाम से विख्यात कौशिक गाधि की पुत्री सत्यवती काली के साथ एक हजार श्यामकर्ण घोड़े दहेज में देकर किया था। कौशिक गाधि की पुत्री होने के कारण सत्यवती काली! कौशिकी के नाम से भी प्रसिद्ध हुई। इनके साथ अपनी पुत्री का विवाह करने पर भार्गव ऋचीक को हिमालय के दक्षिण में स्थित राजा गाधि के राज्य क्षेत्र गाधिपुरी में भी कुछ भूमि प्राप्त हुआ, जो कोसी नदी से सींचित भूक्षेत्र में स्थित है। वे क्षेत्र वर्तमान में नेपाल और बिहार में स्थित है। जबकि कुछ लोग ऋचिक ऋषि को दी गई भूमि उत्तर प्रदेश के वर्तमान बागी बलिया को बताते हैं।


महेन्द्र गाधि ने अपनी पुत्री और दामाद बने ब्रह्मर्षि ऋचिक को उपहार के रूप में जो भूमि दिये थे वह कर (राजस्व) मुक्त होने के कारण विमुक्त क्षेत्र कहलाया। इस विमुक्त क्षेत्र में भृगु ऋषि के आने के कई कथानक आर्ष ग्रन्थों में मिलते हैं। पौराणिक, ऐतिहासिक आख्यानों के अनुसार प्रचेता के नाम से प्रसिद्ध ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु ऋषि के द्वारा हिमालय के दक्षिणी दिशा में रहने वाले दैत्य, दानव और मानव जातियों के राजाओं के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर मेलजोल बढ़ाने से हिमालय के उत्तरी दिशा में रहने वाले देव, गन्धर्व, यक्ष जातियों के नृवंशों में आक्रोश पनप रहा था। जिससे सभी लोग देवों के संरक्षक ब्रह्माजी के परपौत्र विष्णु को दोष दे रहे थे। दूसरे बारहों आदित्यों में भार्गवों का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा था। इसी बीच ब्रह्मर्षि भृगु के श्वसुर दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने हिमालय के उत्तर के राज्य हरिवंशपुर (चीन) पर चढ़ाई कर दिया। जिससे महर्षि भृगु के परिवार में विवाद होने लगा। महर्षि भृगु यह कह कर कि राज्य सीमा का विस्तार करना राजा का धर्म है, अपने श्वसुर का पक्ष ले रहे थे। इस विवाद में विष्णु जी ने लक्ष्मी सेे मिलनेे आयी भृृगु ऋषि की पहली पत्नी हिरण्यकशिपु नन्दिनी (पुत्री) देवी दिव्या को मार डाला। इससे क्रोधित होकर महर्षि भृगु ने अपने दामाद श्री विष्णु जी से सम्बन्ध खत्म कर लिये। भृगु ऋषि के द्वारा विष्णु को अपमानित कर के त्याग देने की घटना ही ग्रन्थों में भृगु ऋषि के द्वारा विष्णु को लात मारना कहलाता है। 


इस विवाद का निपटारा महर्षि भृगु के छोटे भाई और विष्णु जी के दादा मरीचि मुनि ने इस निर्णय के साथ किया कि भृगु हिमालय के दक्षिणी भाग में जाकर रहें। उनके दिव्या देवी से उत्पन्न पुत्रों के सम्मान सहित पालन-पोषण की जिम्मेदारी देवगण उठायेंगे। परिवार की प्रतिष्ठा-मर्यादा की रक्षा के लिए भृगु जी को यह भी आदेश मिला कि वे श्री हरि विष्णु की आलोचना नहीं करेंगे। इस प्रकार महर्षि भृगु सुषानगर (सुमेरिया/पर्शिया/ ईरान) से अपनी दूसरी पत्नी पौलोमी को साथ लेकर अपने छोटे पुत्र ऋचीक के पास गाधिपुरी (वर्तमान बलिया और गाजीपुर का इलाका) में आ गये।


महर्षि भृगु के इस क्षेत्र में आने का दूसरा आख्यान कुछ धार्मिक ग्रन्थों, पुराणों में भी मिलता है। देवी भागवत के चतुर्थ स्कन्ध, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण और श्रीमद्भागवत के विभिन्न खण्डों में बिखरे वर्णनों के अनुसार महर्षि भृगु प्रचेता नामक उस ब्रह्मा के पुत्र हैं, जो सुमेरु पर्वत पर वास करते हैं। भृगु ऋषि का विवाह प्रजापति दक्ष की पुत्री ख्याति से हुआ था। जिनसे इनके दो पुत्र काव्य-शुक्र और त्वष्टा तथा एक पुत्री ‘श्री’ लक्ष्मी का भी जन्म हुआ था। इनकी पुत्री ‘श्री’ का विवाह श्री हरि विष्णु से हुआ। दैत्यों के साथ हो रहे देवासुर संग्राम में महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति जो योगशक्ति सम्पन्न तेजस्वी महिला थी। वह दैत्यों की सेना के मृत सैनिकों को अपने योगबल से जीवित कर देती थी। जिससे नाराज होकर श्रीहरि विष्णु ने शुक्राचार्य की माता, भृगुजी की पत्नी ख्याति का सिर अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया था। अपनी पत्नी की हत्या होने की जानकारी होने पर महर्षि भृगु भगवान ने विष्णु को शाप देते हुए कहा था कि तुम्हें स्त्री के पेट से बार-बार जन्म लेना पड़ेगा। उसके बाद महर्षि अपनी पत्नी ख्याति को अपने योगबल से जीवित कर के सुमेरु के नाम से प्रसिद्ध पर्वतराज हिमाचल की बेटी गंगा के तट पर स्थित क्षेत्र में चले गए और वहीं पर तमसा देवी को जन्म दिये। अर्थात तमसा नदी की सृष्टि किये।


पद्म पुराण के उपसंहार खण्ड की कथा के अनुसार मन्दराचल पर्वत पर हो रहे यज्ञ में ऋषि-मुनियों में इस बात पर विवाद छिड़ गया कि त्रिदेवों (ब्रह्मा-विष्णु-शंकर) में श्रेष्ठ देव कौन है? देवों की परीक्षा के लिए ऋषि-मुनियों ने महर्षि भृगु को परीक्षक नियुक्त किया था।


त्रिदेवों की परीक्षा लेने के क्रम में महर्षि भृगु सबसे पहले भगवान शंकर के कैलाश (हिन्दूकुश पर्वत श्रृंखला के पश्चिमी भाग में स्थित कोह सुलेमान जिसे अब ‘कुराकुरम’ कहते हैं) पहुंचे, उस समय भगवान शंकर अपनी पत्नी सती के साथ विहार कर रहे थे। नन्दी आदि रूद्रगणों ने महर्षि को प्रवेश द्वार पर ही रोक दिया। इनके द्वारा भगवान शंकर से मिलने की हठ करने पर रूद्रगणों ने महर्षि को अपमानित भी कर दिया। कुपित महर्षि भृगु ने भगवान शंकर को तमोगुणी घोषित करते हुए लिंग रूप में पूजित होने का शाप दिया।


यहाँ से महर्षि भृगु ब्रह्मलोक (सुषानगर, पर्शिया, ईरान) में ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी अपने दरबार में विराज रहे थे। सभी देवगण उनके समक्ष बैठे हुए थे। भृगु जी को ब्रह्माजी ने बैठने तक को नहीं कहे। तब महर्षि भृगु ने ब्रह्माजी को रजोगुणी घोषित करते हुए अपूज्य (जिसकी पूजा ही नहीं होगी) होने का शाप दिया। कैलाश और ब्रह्मलोक में मिले अपमान-तिरस्कार से क्षुभित महर्षि विष्णुलोक चल दिये।


भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीर सागर (श्रीनार फारस की खाड़ी के पास स्थित बन्दी-रमा नामक स्थान पर स्थित पहाड़ी (शेषनाग) पर अपनी पत्नी श्री लक्ष्मी देवी के साथ विहार कर रहे थे। उनसे मिलने की इच्छा जताने पर विष्णु के सेवकों ने बताया कि अभी वे सो रहे हैं। इस पर वे विष्णु जी के जागने का इन्तजार करने लगे। लेकिन काफ़ी समय तक इन्तजार करने पर भी जब विष्णु जी ने उनकी ओर नहीं देखा तो महर्षि भृगुजी को लगा कि हमें आया हुआ देख कर ही विष्णु सोने का नाटक कर रहे हैं। इस अपमान से उन्हें अपनी पहली पत्नी हैरण्य दिव्या देवी की विष्णु के द्वारा हत्या करने की घटना याद आ गई। 


अपने दामाद के द्वारा किये जा रहे तिरस्कार से क्रोधित होकर भृगु ऋषि ने अपने दाहिने पैर का आघात श्री विष्णु जी की छाती पर कर दिया। महर्षि के इस आचरण पर उनकी पुत्री लक्ष्मी जो श्रीहरि के चरण दबा रही थी कुपित हो उठी। कहते हैं कि इस घटना से क्षुब्ध हुए श्रीविष्णु जी ने महर्षि का पैर पकड़ लिया और शापित होने के भय से अपनी भूल के लिए माफ़ी माँगते हुए कहा कि हे भगवन्! मेरे कठोर वक्ष से आपके कोमल चरण में चोट तो नहीं लगी। इससे सन्तहृदयी महर्षि भृगु अपने व्यवहार से लज्जित तो हुए ही उनका क्रोध भी शान्त हो गया। अपने दामाद में हुए इस हृदय परिवर्तन से प्रसन्न होकर उन्होंने श्रीहरि विष्णु को त्रिदेवों में श्रेष्ठ और सतोगुणी घोषित कर दिया। 


ब्रह्मर्षि भृगु जी के द्वारा लिए गए त्रिदेवों की इस परीक्षा में जहाँ एक बहुत बड़ी सीख छिपी हुई है। वहीं वेदों को विभाजित कर के पुराणों की रचना करने वालों ने निर्दोष भृगु ऋषि की छवि को खराब करने के लिए जानबुझ कर कुछ ऐसे आख्यान गढ़ दिये जिससे भृगुवंशियों को नीचा दिखाया जा सके। इसमें लेखकों की बहुत बड़ी कूटनीति भी छिपी हुई थी। अपने उपेक्षा करने वाले को भी क्षमा कर देने वाले भृगु की छवि खराब करने के लिए इनकी लोकप्रियता से जलने वालों ने एक कहावत रच दी - 

क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात।

का हरि को घट्यो गए, ज्यों भृगु मारि लात।।

इस घटना में कूटनीति यह थी कि हिमालय के उत्तर के नृवंशों का संगठन बनाकर रहने से श्री हरि विष्णु के नेतृत्व में सभी जातियां सभ्य, सुसंस्कृत बन उन्नति कर रही थी। वहीं हिमालय के दक्षिण का नृवंश समुदाय जिन्हें दैत्य-दानव, मरूत-रूद्र आदि नामों से जाना जाता था। परिश्रमी होने के बाद भी असंगठित, और असभ्य जीवन जी रही थी। ये जातियां रूद्रगणों और शंकर को ही अपना नायक-देवता मानती थी। उनकी ही पूजा करती थी। हिमालय के दक्षिण में आदित्यों के नायक श्रीविष्णु को प्रतिष्ठापित करने के लिए महर्षि भृगु ही सबसे उपयुक्त माध्यम थे। उनकी एक पत्नी दैत्यकुल से थी, तो दूसरी दानव कुल से थी और उनके पुत्रों शुक्राचार्य-अत्रि, त्वष्टा-मय-विश्वकर्मा तथा भृगुकच्छ में च्यवन तथा गाधिपुरी (भारत के उत्तर प्रदेश में स्थित गाजीपुर-बलिया का क्षेत्र) में ऋचीक (और्व) का बहुत मान-सम्मान था। इस त्रिदेव परीक्षा से हिमालय के दक्षिणी भाग में रहने वाले भृगुवंशियों की सहायता से श्रीहरि विष्णु की प्रतिष्ठा स्थापित होने लगी। विशेष रूप से राजाओं के अभिषेक में श्री विष्णु का नाम लिया जाने लगा। भार्गवों की सहायता और आशिर्वाद से हिमालय पार के सूर्य, मङ्गल और शनि आदि देवों को प्रभुत्व और सम्मान (मान्यता) दिया जाने लगा।


पुराणों में वर्णित आख्यान के अनुसार त्रिदेवों की परीक्षा में विष्णु जी के वक्ष पर पद प्रहार करने वाले महर्षि भृगु को दण्डाचार्य मरीचि ऋषि ने पश्चाताप करने के लिए अनवरत यात्रा (उदासीन यात्रा) करने की सजा सुनाते हुए बाँस की एक छड़ी देकर यह निर्देश दिया कि जिस धरा पर इस बाँस की छड़ी में कोंपले फूट पड़े और आपके कमर से मृगछाल पृथ्वी पर गिर पड़े, उसी धरा को सबसे पवित्र मान कर प्रवास करेंगे और वहीं पर विष्णु सहस्त्रनाम का जप करेंगे तब ही आप अपने पूर्व पद पर पुनः आसीन होंगे और आपके इस पाप का मोचन होगा। 


अपने धाम को त्याग कर अनिश्चित और अज्ञात धाम की तलाश में महर्षि भृगु भगवान के द्वारा आरम्भ की गयी यही यात्रा उदासीन यात्रा कहलाया। त्रेता युग में प्रभु श्री रामचन्द्र जी को भी उदासीन यात्रा के लिए जाना पड़ा था। वनवास के लिए अयोध्या को छोड़ते समय अनिश्चित गंतव्य की ओर प्रस्थान करने के समय की स्थिति का उल्लेख करते हुए संत तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है "तापस वेश सुवेश उदासी, चौदह वरष राम वनवासी।।" अर्थात् उदासी तपस्वी की तरह सुन्दर वेश धारण कर के प्रभु श्री रामचन्द्र जी को चौदह वर्षों तक वन में ही वास करना होगा। उदासी पन्थ के अनुयायी अपने घर, परिवार और समाज से कटे होने पर भी धर्म का त्याग नहीं करने वाले लोग होते हैं जो। भूमिहीन और बेघर होकर अपनी मूल भूमि से विस्थापित होकर भी धर्म का परित्याग नहीं करने वाले लोग होते हैं। अतः ऐसे लोग सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोगों के लिए पूजनीय होते हैं। 


उदासीन होने के लिए मन्दराचल से चलते हुए जब महर्षि भृगु विमुक्त क्षेत्र (वर्तमान बलिया जिला उत्तर प्रदेश) के गंगा तट पर पहुँचते ही उनकी छड़ी में कोंपले फूट पड़ी। इससे वे समझ गए कि अब उनकी यात्रा रुकने वाली है। संयोगवश एक दिन गङ्गा नदी के किनारे स्थित वन में विचरण करने के दौरान उन्हें जोरों की प्यास लगी। नदी के जल से प्यास बुझा कर जैसे ही वहाँ से प्रस्थान करना चाहे कमर में बँधी हुई उनकी मृगछाला ढ़िली होकर भूमि पर गिर गई। इससे वे समझ गए कि इसी जगह पर हमें प्रवास करना है। फिर वे गङ्गा नदी के उस क्षेत्र को अविमुक्त क्षेत्र समझ कर प्रवास करने के लिए कुटिया बनायें और तपस्या में लीन हो गये। कालान्तर में यही क्षेत्र महर्षि भृगु के नाम से भृगुक्षेत्र कहलाया। वर्तमान में इसी भूमि पर स्थित बागी बलिया (उत्तर प्रदेश, भारत) नामक नगर बस गया, जो स्वतंत्रता संग्राम में प्रथम आजाद जिला के नाम से जाना जाता है।


महर्षि भृगु के जीवन से जुड़े ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक सभी पक्षों पर प्रकाश डालने के पीछे मेरा सीधा मन्तव्य है कि पाठक अधूरी और अपूर्ण जानकारी के कारण पाखण्डी और आडम्बरवादी न बनें, बल्कि सत्य को स्वीकार कर के उदासी धर्म के मार्ग पर चलते हुए स्वविवेक का प्रयोग कर सके। हमारे धार्मिक ग्रन्थों में हमारे मनीषियों के वर्णन तो प्रचुर है, परन्तु उसी प्रचुरता से उसमें कल्पित घटनाओं को भी जोड़ा गया है। उनके जीवन को महिमामण्डित करने के लिए पौराणिक कथाओं के लेखकों ने उनकी ऐतिहासिकता से खिलवाड़ किया है, जिसके कारण भगवान भृगु जैसे लोगों के लिए भी शिव पुराण और हरिवंश पुराण में अपमान जनक शब्दों का प्रयोग किया गया है। इसके कारण भृगुवंशियों को भी कभी-कभी अपमानित होना पड़ जाता है। इसके कारण कभी-कभी तो ऐसी स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है जो संग्राम और महासंग्राम का भी कारण बन जाता है। वृत्रासुर के द्वारा कौशिकों के देश में आने वाले जल प्रवाह के मार्ग को अवरुद्ध करने के कारण जब उनके राज्य की नदियाँ सूखने लगी, पेड़-पौधे सूख गए, खेतीबाड़ी बन्द हो गई, उनके निवासी अपनी भूमि छोड़ कर अन्य देशों की ओर पलायन करने लगे तब यज्ञ के द्वारा वर्षा करवाने का निर्णय लेकर जब राजा विश्वामित्र भगवान तैयारियों में लग गए तब वृत्रासुर ने उनके द्वारा यज्ञ कार्य के लिए लाये हुए सभी गायों का हरण कर लिया था। इससे पञ्चगव्य आदि के अभाव में खण्डित हो रहे यज्ञ की सुरक्षा के लिए जब कौशिक विश्वामित्र जी ने वशिष्ठ ऋषि से सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाली कामधेनु गाय माँगने गये थे। लेकिन उनके पूर्वज़ भृगु के प्रति अपमान जनक बोल बोलते हुए किसी भी ब्राह्मण को उनके यज्ञ में सम्मिलित नहीं होने देने की धमकी देने से आक्रोशित होकर कौशिक विश्वामित्र भगवान ने वशिष्ठ ऋषि की गाय को जबरन ले जाने लगे थे। इसके कारण वशिष्ठ के सभी पुत्रों और शिष्यों ने अपने आश्रम में अतिथि के रूप में आये हुए भृगुवंशी राजा कौशिक विश्वामित्र भगवान पर आक्रमण करके दिया था। शिकार खेलने के दौरान अपने सैनिकों से भटक कर वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में अतिथि के रूप में आये हुए राजा कौशिक विश्वामित्र भगवान के साथ किये गये दुर्व्यवहार के कारण हुए उस संघर्ष का दोषी वशिष्ठ थे, इसके बावजूद उनके शिष्यों ने कथा लिखते समय सारा दोषारोपण राजा विश्वामित्र जी पर थोप दिया था। सिर्फ़ इतना ही नहीं वशिष्ठ ने छल पूर्वक कौशिक विश्वामित्र भगवान के सौ पुत्रों की हत्या भी कर दी थी। जिसका बदला लेने के लिए राज-पाट त्याग कर वे तपस्वी बन गये थे। और तपोबल से प्राप्त दिव्य शक्तियों के आगे वशिष्ठ को झुकने के लिए विवश कर दिये थे। 


महर्षि भृगु ने गङ्गा नदी के तट पर स्थित मुक्त क्षेत्र (वर्तमान बलिया जिला, उत्तर प्रदेश) में आने के बाद यहाँ के जंगलों को साफ कराया। यहाँ मात्र पशुओं के आखेट पर जीवन यापन कर रहे जनसामान्य को खेती करना सिखाया। यहाँ गुरूकुल की स्थापना करके लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाया। उस कालखण्ड में इस भू-भाग को नरभक्षी असुरों का निवास माना जाता था। उन्हें सभ्य और सुसंस्कृत बनानें का कार्य महर्षि भृगु और उनके बाद शुक्राचार्य जी के द्वारा किया गया था। कश्यप ऋषि की बड़ी पत्नी दिति देवी से जन्में दैत्यों, दनु देवी से जन्में दानवों, रक्षिका देवी से जन्में राक्षसों सहित अन्य असूरों के विकास के कार्य में मदद करने से नाराज़ कश्यप ऋषि की पत्नी अदिति देवी के पुत्रों के द्वारा विरोध करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं था। लेकिन दक्षिणा लोभी वशिष्ठों ने सदैव भोग-विलास में लिप्त रहने वाले आदित्यों के अधर्म को वीरोचित कर्म कह कर खुल कर प्रशंसा किया तो सदैव धर्म रक्षार्थ दान, दया और तप में लीन रहने वाले असूरों के प्रति अपमान जनक शब्दों का प्रयोग करते हुए दानवेन्द्र बलि जैसे धर्मात्मा को भी अधर्मी कह कर मान मर्दन का ही काम किया है। असूरों की बेटियों को बन्दी बना कर सदैव भोग-विलास में लिप्त रहने वाले इन्द्र, मित्र, वरुण और विष्णु की कथाओं से ही देवों का व्यक्तित्व पता चलता है। राक्षसेन्द्र रावण ने अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए भगवती सीता मइया का सिर्फ़ हरण किया था, लेकिन विष्णु ने तुलसी मइया के साथ जो किया था, क्या वह उचित? इन्द्र ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ जो किया था, क्या वह सही था? श्रीकृष्ण ने निर्दोष बाणासुर के सहस्त्र भाईयों का वध करके उनकी विधवा पत्नियों को द्वारका की नगर वधु बना कर क्या धर्म का काम किये थे?... बिल्कुल नहीं। इसके बावजूद उन अधर्मियों की सैकड़ों-हजारों वर्षों के बाद भी पूजा-पाठ और असली धर्माधिकारियों का विभिन्न पर्व-त्योहार के अवसर पर अपमान करने की प्रथा चला कर असुरों के वंशज़ों के हृदय पर कुठाराघात करना कैसे धर्म है? जिस तरह कश्यप भगवान की पत्नी अदिति देवी से जन्में आदित्य गण कच्छवाहा हैं, उसी तरह कश्यप ऋषि की ही अन्य पत्नियों से जन्में लोग भी कच्छवाहा ही हैं। लेकिन कच्छवाहा सम्मेलनों में सभी कच्छवाहों को आमंत्रित करने के बाद आदित्यों के वंशज़ों के द्वारा दिती और दनु आदि अन्य माताओं से जन्में कच्छवाहों के लिए बोले गये अपमान जनक शब्दों के कारण जब आज तक कच्छवाहा वंश के लोग ही एकजुट नहीं हो सके हैं तो अन्य लोगों के वंशज़ों को एकजुट करने की परिकल्पना कैसे साकार हो सकता है? विश्व बन्धुतव की विचारधारा पर चल कर ही इस स्वप्न को साकार किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए वशिष्ठ जैसे लोगों को सकारात्मक सोच को विकसित करने वाले साहित्य लिखने चाहिए। इतिहास लेखन का कार्य करने वाले लोगों को भी पक्षपात पूर्ण मनगढंत बातें लिखने के बजाए अच्छी हो या बूरी सभी पहलुओं पर विचार करते हुए सच्ची खबरें लिखनी चाहिए। ताकि भावी पीढ़ी के लोगों को ऐतिहासिक घटनाओं से प्रेरणा मिल सके। 


भृगु संहिता

======= संपादन जारी

महर्षि भृगु के परिवारिक जीवन से अपरिचित जन भी महर्षि द्वारा प्रणीत ज्योतिष-खगोल के महान ग्रंथ भृगु संहिता के बारे में जानते है। इस नाम से अनेक पुस्तके आज भी साहित्य विक्रेताओं के यहाॅ बिकती हुई दिखाई देती है।


महर्षि ने भृगु संहिता ग्रंथ की रचना अपनी दीर्घकालीन निवास की कर्म भूमि विमुक्त भूमि बलिया में ही किया था। इस सन्दर्भ दो बातें ध्यान देने की है। पहली बात यह है कि अपनी जन्मभूमि ब्रह्मलोक (सुषानगर) में निवास काल में उनका जीवन झंझावातों से भरा हुआ था। अपनी पत्नी दिव्या देवी की मृत्यु से व्यथित और त्रिदेवों की परीक्षा के उपरान्त जन्म भूमि से निष्कासित महर्षि को उसी समय शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर मिला जब वह विमुक्त भूमि में आये। भृगुकच्छ गुजरात में पहुॅचने के समय तक उनकी ख्याति चतुर्दिक फैल चुकी थी। क्योंकि उस समय तक उनके भृगु संहिता को भी प्रसिद्धि मिल चुकी थी और उनके शिष्य दर्दर द्वारा भृगुक्ष्ेत्र में गंगा-सरयू के संगम कराने की बात भी पूरा आर्यवर्त जान चुका था। आख्यानों के अनुसार खम्भात की खाड़ी में महर्षि के पहुॅचने पर उनका राजसी अभिनन्दन किया गया था, तथा वैदिक विद्वान ब्राह्मणों ने स्वस्तिवाचन करते हुए उन्हे आत्मज्ञानी ज्योतिष के प्रकाण्ड पण्डित के रूप में उनकी अभ्यर्थना की थी। जिससे यह बात प्रमाणित होती है कि महर्षि द्वारा भृगु संहिता की रचना सुषानगर से निष्कासन के बाद और गुजरात के भृगुकच्छ जाने से र्पूर्व की गई थी।


महर्षि की इस संहिता द्वारा किसी भी जातक के तीन जन्मों का फल निकाला जा सकता है। इस ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करने वाले सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति,शुक्र शनि आदि ग्रहों और नक्षत्रों पर आधारित वैदिक गणित के इस वैज्ञानिक ग्रंथ के माध्यम से जीवन और कृषि के लिए वर्षा आदि की भी भविष्यवाणियां की जाती थी।


महर्षि के कालखण्ड में कागज और छपाई की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। ऋचाओं को कंठस्थ कराया जाता था और इसकी व्यवहारिक जानकारी शलाकाओं के माध्यम से शिष्यों को दी जाती थी। कालान्तर में जब लिखने की विधा विकसित हुई और उसके संसाधन मसि भोजपत्र ताड़पत्र आदि का विकास हुआ, तब कुछ विद्वानों ने इन ऋचाओं को लिपिबद्ध करने का काम किया। 

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